कर्मगत अवरोध एक दुर्भाग्य हैं, अपने प्रति करुणा रखें—मन और ऊर्जा की गिरावट वाला दिन = कठिन दिन
कर्मगत अवरोध एक दुर्भाग्य है: मनोदशा और ऊर्जा के गिराव में बीता दिन = पीड़ा भरा दिन = मशक्कत भरा दिन
पिछले 10 से अधिक वर्षों में, जब भी कोई दिन मनोदशा और ऊर्जा के गिराव में बीता, कुछ भी नहीं किया, बस भीतर ही भीतर घुटता रहा, उदासी में डूबा रहा, काम टालता रहा, तो खुद पर ही हमला करने लगता था—मैं कितना खराब हूँ, फिर एक दिन बर्बाद कर दिया। लेकिन कौन नहीं चाहता कि उसका दिन धूप-सा खिला हुआ, सुख और उल्लास से भरा बीते? क्या यह सब निजी स्वामित्व की ऐतिहासिक प्रक्रिया से उपजी बेबसी और कर्मगत अवरोध की यातना की वजह से ही नहीं होता?
अच्छी मनोदशा और भरपूर ऊर्जा वाला दिन बेशक खुशी की बात है, उसमें सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ और आनंद भरे होते हैं, तो उसे मशक्कत भरा दिन कैसे कह सकते हैं? मनोदशा और ऊर्जा के गिराव में बीता दिन ही तो सचमुच मशक्कत भरा होता है।
पहले मैं सोचता था, अरे, आज कितना निढाल पड़ा रहा, कुछ भी नहीं किया, अब व्यायाम करने मत जाओ, अभी थोड़ा समय बचा है तो जल्दी से कुछ काम कर लो। अब सोचता हूँ, अरे, सचमुच मशक्कत भरा दिन था, थोड़ी देर खेलकर खुद को इनाम दे दूँ।
अक्सर बड़े होने के बाद, जब लोग अपने अतीत के बुरे दौर में बेबस पड़े अपने आप को याद करते हैं, तो खुद को यह कहकर दोष नहीं देते कि तब हर दिन मनोदशा और ऊर्जा इतनी गिरी हुई क्यों रहती थी, रोज़ भरपूर ऊर्जा के साथ मेहनत करके छिंगहुआ या पेकिंग विश्वविद्यालय में दाखिला क्यों नहीं लिया, या IELTS और LeetCode की जमकर तैयारी करके कनाडा क्यों नहीं चले गए। बल्कि कहते हैं, उस समय मेरे लिए सचमुच कितना मुश्किल था, एक-एक दिन बड़ी तकलीफ़ से काट रहा था।
आगे चलकर, जब मेरी मनोदशा बेहतर होगी और मुझमें ज़्यादा ऊर्जा होगी, तब मैं भी पलटकर आज के अपने आप को देखूँगा: सचमुच मशक्कत भरा दिन था।