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कर्मजनित बाधाओं की शृंखला

पूर्वी एशिया के छोटे कस्बों के लड़के: सर्वशक्तिमान दबंग मालिक से असमर्थ साधारण इंसान तक

पूर्वी एशिया के छोटे कस्बे का लड़का: सर्वशक्तिमान हुक्मरान से असमर्थ साधारण इंसान तक

पहले मैं तरह-तरह के पेशों, भूमिकाओं और परिस्थितियों के लिए जानकारी और क्षमताएँ जुटाकर रखता था। यह सर्वशक्तिमान होने के आत्ममोह की लालसा थी, हीनभावना से उपजा डर था, सबको खुश रखने वाले व्यक्तित्व का खुद को एक वस्तु में बदल लेना था। अब अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली है, तो बहुत हल्का महसूस करता हूँ।

एक, पूर्वी एशिया के दुलारे बेटे को हुक्मरान बनाने की योजना

इसकी जड़ पूर्वी एशियाई संस्कृति में पुरुषों पर थोपी जाने वाली अनुशासन-व्यवस्था है। पुरुष को प्रथम लिंग माना जाता है, और उस पर लागू अनुशासन स्त्रियों से अलग होता है। महत्त्वाकांक्षा और बड़ी होती है, और भी ज़्यादा “स्वेच्छा से” अपनाई हुई। बचपन से माता-पिता अपने दुखड़े सुनाते हैं कि उनकी ज़िंदगी कितनी कठिन है, वे कितने बेचारे हैं, भाई-बहन कितने नाकाबिल हैं। कहते हैं कि हमारा पूरा फलाँ खानदान तुमसे उम्मीद लगाए बैठा है, तुम्हारे ही सहारे है। तुम्हें अपनी तकदीर पलटनी है, सिर ऊँचा करना है, सबसे आगे निकलना है, अपने साथ पूरे कुनबे को ऊँचा उठाना है, कुल का नाम रोशन करना है।

नन्हे कंधों पर हज़ारों किलो का बोझ लाद देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि तुम्हें प्यार की कमी है और तुम प्यार के लिए तरसते हो। वे कैसे नहीं जानेंगे? निषेचित अंडाणु से लेकर तुम्हें नंग-धड़ंग बड़ा होते देखा है; सब कुछ इसी योजना का हिस्सा है।

बचपन से शर्तों पर मिलने वाले महत्त्व की आदत पड़ गई। पर्याप्त काबिल होने पर ही महत्त्व मिलता है, तभी लगता है कि शायद प्यार मिल रहा है। इस तरह योग्यता और उपलब्धि को ही सब कुछ मानने वाली व्यवस्था में अंतहीन होड़ शुरू हो जाती है। अपने मूल परिवार का दुलारा बेटा, सबके लिए अपना खून निचुड़वाने वाला, बलि का बकरा—सब कहते हैं कि उन्हें तुम्हारा सहारा चाहिए, लेकिन तुम ही अकेले हो जिसका कोई सहारा नहीं।

दो, पूर्वी एशियाई हुक्मरान

पूर्वी एशियाई संस्कृति “हुक्मरान, परिवार के सर्वेसर्वा” से अपेक्षा करती है कि वह घर, देश और दुनिया के हर मामले की चिंता करे:

  1. शिक्षाशास्त्री: खुद को शिक्षित करे, अपने बच्चों को और भाई-बहनों के बच्चों को शिक्षित करे;
  2. राजनेता: सत्ता के संघर्ष सँभाले, खानदान की ताकत और दौलत बढ़ाए; सैन्य रणनीतिकार भी हो;
  3. व्यापारी, धनकुबेर, उद्यमी: अकूत संपत्ति जुटाए, सबका खर्च उठाए और सबके सारे काम सँभाले; लियू च्यांगदोंग जैसा।
  4. प्रबंधन का महारथी: मानव स्वभाव और नैतिकता की गहरी समझ रखे, कंपनी और परिवार का प्रबंधन करे;
  5. अपराध-जगत और वैध व्यवस्था, दोनों में पकड़ रखे: समाज की पेचीदगियाँ, अनहोनी, अनकहे नियम, हिंसा;
  6. विशेष बलों का सैनिक: सड़क पर तरह-तरह की लड़ाइयों से निपटे; माहिर ड्राइवर हो और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी गाड़ी चला सके;
    …इसीलिए ज़ेंग गुओफ़ान, ज़ुओ ज़ोंगतांग, हू शुएयान और ली युनलोंग लोकप्रिय हो जाते हैं।

तीन, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ

जब से मैंने अपनी क्षमताओं और ऊर्जा की सीमाएँ गहराई से समझीं, अपनी परिस्थितियों को समझा, दूसरों के हिस्से के मसलों में उलझना छोड़ दिया, उन लोगों को तवज्जो देना बंद किया जिनमें खुद करने की सामर्थ्य है लेकिन फिर भी मुझसे चिपके रहते हैं, और उन लोगों को भी जो अपने किए का फल भुगत रहे हैं, तब से मैंने दूसरों के भाग्य का सम्मान करना सीख लिया है। बिना किसी शर्त के आत्मविश्वास और सहजता के साथ जीना, अब «सफलता से खुद को साबित करना, और खुद को साबित करके सफल होना» छोड़ देना—इसके बाद मैं खुद से सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान होने की माँग नहीं करता। अब दूसरों को अपनी नकारात्मकता मुझ पर उँडेलने नहीं देता, न ही सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बनकर उन्हें सब कुछ सँभाल लेने का वादा करता हूँ।

खासकर जब मेरा बच्चे पैदा करने का इरादा ही नहीं है, तो मुझे बच्चे के लिए इतनी सारी क्षमताएँ, संसाधन और रिश्ते जुटाने की ज़रूरत नहीं है—मानो यह सब एक आदर्श राजवंश खड़ा करने के लिए हो, या खुद को अपना एक आदर्श बचपन लौटाने के लिए। मेरा यह इरादा भी नहीं है कि एक बच्चा पैदा करूँ, फिर प्यार की उसकी तड़प का इस्तेमाल करके उसे मजबूर करूँ कि वह मेरी मर्ज़ी के मुताबिक चले और मेरी देखभाल करने वाला हुक्मरान बने।

भाड़ में जाए यह हुक्मरान बनना, मैं तो बस एक साधारण इंसान हूँ। अब मैं खुद को पूर्वी एशिया का महापिता नहीं मानता, इसलिए अब पिता बनकर धौंस नहीं जमाता, उपदेश नहीं देता।

चार, बाकी जीवन में बस एक काम है: यह जीवन गुज़ारना, इसे पूरा कर लेना। हल्केपन और सहजता के साथ

दुनिया में हर जगह बेतुकी बातें हैं, और अब मेरा भी तर्क करते फिरने का मन नहीं है।

हमें कभी सिखाया गया था कि पहाड़ बनो, सब कुछ अपने ऊपर उठाओ। अब जानता हूँ कि मैं पानी हूँ—बेरंग, निराकार, बिना किसी शर्त के सहज, प्रकृति और मनुष्य की एकता में। अब अकड़कर हर वज्रपात नहीं झेलता, बल्कि लचीलेपन से परिस्थितियों के अनुरूप ढलता हूँ, अपने मन और भाग्य के साथ बहता हूँ।

अब ऐसा नहीं लगता कि अनंत पीढ़ियों तक चलते रहना है, किसी महान चीज़ को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपना और उसकी रक्षा करनी है। बस अपनी आत्मा, अपनी खुशी और शांति की रक्षा करनी है।

स्क्रॉल करते हुए सामने आने वाली तरह-तरह की सूचनाएँ अब नहीं पढ़ता। बहुत दूर के भविष्य के मसलों, समाज के कोने-अँतरों में छिपे पेचीदा मसलों, बच्चों की शिक्षा और बड़े होने से जुड़े ढेरों मसलों, और दूसरों के अपने किए से पैदा हुए मसलों पर अब पहले से ही बेवजह माथापच्ची नहीं करता।

उलटे, अब सहज प्रवाह के साथ चल पाता हूँ, जैसा हूँ वैसा रह पाता हूँ, खुद से प्यार कर पाता हूँ, अपनी खूबियों को काम में लाता हूँ और कमज़ोरियों से बचकर चलता हूँ। जो कुछ हासिल होता है, स्वाभाविक रूप से होता है।

हल्कापन और सहजता।