च्वांग-त्सु: मूल स्व का तितली बन जाना
च्वांग-त्सु · मूल अहम् का तितली बनना
एक、लघु अहम् मैं नहीं हूँ
मैं किसी भी चीज़ का स्वामी नहीं हूँ, मैं अपना भी स्वामी नहीं हूँ।
मैं अतीत और भविष्य का स्वामी नहीं हूँ, वर्तमान का भी नहीं।
मनुष्य इतिहास और नियति की धारा में सीमित है।
मनुष्य का कर्म: मुझे बस इतना करना है कि मोह और आसक्ति में और अधिक न उलझूँ; जागरण और साधना पीड़ा घटा सकते हैं, आनंद बढ़ा सकते हैं।
दो、बागडोर सँभालना
विचार धागे का सिरा है। उस सिरे के सहारे सुराग का पीछा करो, तो उसके पीछे की आसक्ति और आसक्ति के पीछे का लघु अहम् दिखाई देता है। अक्सर सत्तर-अस्सी तरह की आसक्तियाँ होती हैं, जिनके पीछे आठ-नौ लघु अहम् होते हैं। ये आविष्ट मायाछवियाँ, बिखरे विचार और अव्यवस्था उस व्यक्ति पर हावी रहते हैं।
लघु अहम् कैंसर के घाव जैसा है: वह सोखता है, जगह घेरता है और खुद को मजबूत करता जाता है। मूल अहम् को झाड़-बुहारकर इन प्रेतों को भगाना है।
अब मैं, यानी मूल अहम्, बागडोर सँभालूँगा। मूल अहम् का जागरण। मूल अहम् के बागडोर सँभालने के बाद नियति भी “अच्छी” हो जाएगी।
मूल अहम् कोई विचार नहीं है, न ही सोचने का कोई बिल्कुल नया ढंग है; चिंतन के लिए मूल अहम् अचिंत्य है।
मूल अहम् जीवन के उसूलों और भीतर की आवाज़ के रूप में प्रकट होता है, जो खुद से कहती है: इस तरह मत सोचो, मत सोचो।
मूल अहम् के बागडोर सँभालने के बाद आनंद मिलेगा, सुंदरता दिखाई देगी। क्योंकि शांत होने पर ही आनंद मिल सकता है, सुंदरता दिखाई दे सकती है।
आनंद है अप्रसन्नता का हट जाना, ढीलापन, विश्राम, सुरक्षा, शांति—मानो सज़ा पूरी होने पर जेल से रिहा हुए हों और हँसी रोके न रुक रही हो।
तीन、मूल अहम् ब्रह्मांड का एक हिस्सा है
मूल अहम् की कोई योजना या कोई कार्य नहीं है, मूल अहम् का कोई नाम नहीं है।
मूल अहम् केवल वर्तमान के इसी क्षण में है, शांत, निस्तब्ध, बिना किसी उद्देश्य के। एक क्षण के बाद दूसरा क्षण; जुड़ने पर भी वे एक ही क्षण हैं, ब्रह्मांड का एक क्षण।
मूल अहम् बिजली, चुंबकत्व, प्रकाश और ऊष्मा की तरह, परमाणुओं और निहारिकाओं की तरह, ब्रह्मांड का एक हिस्सा है। प्रकृति और मनुष्य एक हैं; वह बस ब्रह्मांड में विद्यमान है।
मूल अहम् स्वभाव है, ताओ है। वह ब्रह्मांडीय प्रकृति है। ब्रह्मांड रहस्यमय है; संभव है कि मानवजाति उसे समझ न पाए। मनुष्य ब्रह्मांड की रचना है, पर लघु अहम् ब्रह्मांड से ऊपर उठ बैठना चाहता है, उसे नियंत्रित करना चाहता है। मूल अहम् मानव स्वभाव है। जो चीज़ें ऊपर से मनुष्य के सामाजिक स्वभाव की लगती हैं, वे वास्तव में अमानवीय हैं, अलगाव से ग्रस्त हैं; अमानवीय चीज़ों को हटा देने पर जो बचता है, वही मनुष्य का सार है। जैसे एक मुर्गी एक मुर्गी ही होती है, दो टाँगें और सीने के मांस का एक टुकड़ा नहीं।
चार、तितली बनना
लघु अहम् इल्ली की तरह ऐंठता और रेंगता है, और समझता है कि यही उसका स्वरूप है।
मूल अहम् के बागडोर सँभालते ही तितली में रूपांतरण होता है, पंख उगते हैं, उन्मुक्त विहार होता है।
लघु अहम् एक द्विआयामी, अंधी दुनिया में जीता है, जहाँ हर ओर की माँगों से निपटने की फुरसत नहीं मिलती। मूल अहम् के तितली बन जाने पर दुनिया में एक और आयाम जुड़ जाता है, आकाश मिल जाता है। आकाश से धरती को निहारते हुए मोह और आसक्ति के पार दिखाई देता है; न कुछ आगे है, न पीछे, बस विहार है।
पता चलता है कि मनुष्य धरती पर फँसा हुआ नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड में विहार कर रहा है। पता चलता है कि आकाश में उड़ती तितली ही मनुष्य का असली स्वरूप है।
च्वांग-त्सु ने तितली होने का सपना देखा, सपना देखा कि उनका कोई नाम नहीं, कोई चेहरा नहीं। मैं च्वांग-त्सु हूँ या तितली?