मध्यजीवन संकट का सामना कैसे करें
मध्य आयु में पहुँचकर इंसान दिन-रात व्यस्त रहता है, समय की लहरों और रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में बहता चला जाता है। जीवन अटक जाता है, तन-मन चुक जाता है, और चारों ओर देखकर कुछ सूझता नहीं। अतीत को पछतावे के साथ याद करता है, भविष्य की कल्पनाओं से डरता है। शरीर की क्षमताएँ घटने लगती हैं, परिजन और मित्र बिछुड़ते हैं या दुनिया छोड़ जाते हैं, बच्चे अपनी अलग पहचान बनाने लगते हैं। बच्चों की चिंता सताती है, या लोभ, क्रोध और मोह घेरे रहते हैं। जीवन का असहज, बेहाल और अँधेरा पक्ष आधी रात को पसीने से तर कर देता है। बेबसी और व्यथा में हर रेलिंग को थपथपाते फिरते हैं।
यह मध्यजीवन संकट है, या मनोविज्ञान की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक जीवन-प्रश्नों का संकट + अस्तित्वगत संकट।
यह मानसिक पुनर्जन्म बनाम आत्मा की मृत्यु के बीच आख़िरी विभाजन-बिंदु है। फिर भी जागना होगा, ख़ुद से प्रेम करना होगा, अपने ढंग से जीना होगा।
एक, हल नहीं हो सकता बनाम हल हो सकता है
सामाजिक अर्थ में, मार्क्सवाद के स्तर पर, मध्यजीवन संकट को हल करना “संभव नहीं” है। साइबरपंक की दुनिया में परमाणुओं की तरह बिखरे व्यक्ति अकेले ही समूची व्यवस्था से पैदा हुए अलगाव का सामना करते हैं। च्वांग-त्सु के आंतरिक जीवन के दृष्टिकोण से इसे हल किया जा सकता है। मूल बात है बाहर तलाशना बंद करना और भीतर खोजना। शांति और सुख मिल जाएँ, तो समझिए समाधान मिल गया।
हल न हो सकने का अर्थ यह है कि हम वांग यांगमिंग की तरह सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बन जाने, या वॉरेन बफ़ेट की तरह आर्थिक स्वतंत्रता पा लेने की कल्पना करके, किसी अतिमानवीय तरीके से इसे सुलझाने की उम्मीद नहीं कर सकते। हमें अपने साधारण और औसत होने को स्वीकार करना ही होगा।
यही कारण है कि हमें “मार्क्स + च्वांग-त्सु” की ज़रूरत है।
दो, गतिरोध तोड़ने का ग़लत रास्ता: और ऊँचा, और मज़बूत, और ताक़तवर
बहुत-से लोग अब भी परीक्षा के सवाल हल करने वाली मानसिकता रखते हैं और मेहनत के बल पर गतिरोध तोड़ना चाहते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि बुद्धिमत्ता, सफल करियर, ज़्यादा धन और ज़्यादा समझदारी के सहारे रास्ता निकल आएगा। यह भी आसक्ति और लालसा ही है। इतने वर्षों तक, जब उम्र और ताक़त साथ थीं और अर्थव्यवस्था बढ़ रही थी, तब जो नहीं कर पाए, क्या मध्यजीवन संकट के समय ज़ोर लगाकर कर पाएँगे? दरअसल, यह अब भी वर्तमान में टिककर न रह पाना है, वर्तमान की पर्याप्त क़द्र न करना और उसके प्रति कृतज्ञ न होना है।
इसके उलट, जब आप होड़ छोड़कर सहज अकर्म में रहते हैं, तो ऊर्जा लौटने लगती है। शायद उपयोगिता की दृष्टि से देखें तो आपकी क्षमता और सामाजिक प्रभाव भी बढ़ सकते हैं। जैसे मैं अपने स्वतंत्र ऑनलाइन माध्यम पर काम करता हूँ। ढीले पड़िए, शांत रहिए, सहज अकर्म में रहिए। आपका गहरा मन स्वाभाविक रूप से समाधान खोज लेगा। — यह आंतरिक जीवन का दर्शन है; बहुत-से मित्र शायद अभी इससे परिचित न हों। इस लेख का मक़सद भी यही है।
सीधी बात कहूँ तो कभी-कभी बहुत पढ़ने और सोचते रहने से बेहतर है बच्चों को लेकर झील किनारे टहल आना, हाहा। घूमकर लौटने पर पता चलता है कि बहुत-सी बातें सुलझ गईं और बहुत कुछ समझ में आ गया।
ताओवाद कहता है: कम होने का प्रतिरोध मत करो, उपलब्धि पर अपना बड़प्पन मत जताओ, कामों को साधने की योजनाओं में मत उलझो। च्वांग-त्सु कहते हैं: कुशल व्यक्ति परिश्रम में खपता है, बुद्धिमान चिंता में डूबता है, और जिसे कोई हुनर नहीं आता, वह भरपेट खाकर स्वच्छंद घूमता है।
तीन, समाधान की पद्धति
पद्धति की दृष्टि से, जैसा कि “मार्क्स + च्वांग-त्सु + मनोविज्ञान विचार-ढाँचे का परिचय” में लिखा है, मूल बात आत्मबोध की ओर बढ़ना है, यानी सहज पूर्णता, अपने मूल स्वरूप की शांति, और बिना किसी शर्त के आत्मविश्वास, स्वतंत्रता तथा सहजता।
इसका ठोस तरीका है मार्क्स, च्वांग-त्सु और प्रकृति के मार्गदर्शन में स्वयं—मन की गहराइयों—भीतर के प्रकाश—दूसरों—समाज—इतिहास—दुनिया—प्रकृति—ब्रह्मांड से जुड़ाव बनाना। जुड़ाव का गहरा एहसास, इस क्षण में उपस्थित होने का एहसास और मनुष्य तथा प्रकृति के एक होने का एहसास हमें अपने मूल स्वरूप की शांति, सहज पूर्णता और वर्तमान में सहज उपस्थिति तक पहुँचाता है।
निम्न-मध्यवर्गीय मनोव्यथा से उबरना और अपनी कर्ता होने की चेतना वापस पाना। बाहर तलाशना बंद करना और वर्तमान की शांति खोजना।
ऊर्जा की दृष्टि से, “मार्क्स + च्वांग-त्सु के सहारे जीवन-दृष्टि, विश्व-दृष्टि और मूल्य-दृष्टि के उलझे हुए कोड के ढेर को फिर से गढ़ना” में बात है अपनी बिखरी ऊर्जा समेटने और जीवन-शक्ति वापस पाने की। फिर लिबिडो अपने आप नई दिशाएँ तलाश लेगा। “तीस और चालीस की उम्र के मध्यवय लोगों को मार्क्स और च्वांग-त्सु क्यों पढ़ने चाहिए”
चार, मनोवैज्ञानिक सवाल हल करने वाले लोग
ऊपर की बातें कुछ अमूर्त हैं, तो अब एक दूसरे आयाम से देखें।
लोगों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं को मैं कर्मगत अवरोध कहता हूँ। ये वर्षों से जमा होते आए तरह-तरह के जीवन-प्रश्न हैं। इसलिए ख़ुद से प्रेम करना, अपने ढंग से जीना, अपने जीवन-प्रश्नों पर ध्यान देना और उन्हें दूसरों के जीवन-प्रश्नों से अलग रखना बहुत ज़रूरी है।
डायरी लिखकर और मनोविज्ञान पढ़कर हम अपने तरह-तरह के जीवन-प्रश्नों को देख सकते हैं, जैसे निम्न-मध्यवर्गीय मनोव्यथा, स्व के केंद्रीय आधार का अस्थिर होना, हीनभावना—अहंभाव—आत्मघृणा, कठोर पराहम्, विषाक्त लज्जा, वस्तु-संबंधों से जुड़े प्रश्न, अपनी अलग पहचान बनाने से जुड़े प्रश्न, वगैरह।
हर तरह के छोटे और ठोस प्रश्न के लिए संबंधित अच्छी किताबें और श्याओहोंगशू पर अच्छे पोस्ट मिल जाते हैं। ऐसे मित्रों से भी सलाह ली जा सकती है जो इन प्रश्नों से गुज़र चुके हों।
जैसा कि पिछले लेखों “शैक्षिक योग्यता को लेकर हीनभावना कैसे दूर करें”, “कठोर पराहम् से कैसे निपटें”, “ख़ुद को होड़ छोड़कर आराम करने की अनुमति न दे पाने से कैसे निपटें” और “अपने अँधेरे पक्ष को कैसे अपनाएँ” में दिखाया गया है, छोटे-छोटे प्रश्नों के पीछे प्रश्नों की एक पूरी व्यवस्था होती है, जिसे शुरू से अंत तक सुलझाना पड़ता है।
यह वैसा ही है जैसे पता चले कि आप प्रीडायबिटीज़ की अवस्था में हैं, तो मनोस्थिति, तनाव, नींद, खानपान और व्यायाम सहित हर पहलू पर काम करना पड़ता है।
अच्छी बात यह है कि प्रीडायबिटीज़ की तरह ही, जब भी आप नींद या खानपान जैसे किसी एक प्रश्न को सुलझाते हैं, तो उसके साथ और भी कई समस्याएँ सुलझने लगती हैं और एक सकारात्मक चक्र बनता है।
बहुत-से मध्यवय लोग प्रीडायबिटीज़ का पता चलने के बाद अपनी सेहत सँभालना और ख़ुद से प्रेम करना शुरू करते हैं, और उनके तन-मन की दशा बदल जाती है। या किसी प्रियजन की मृत्यु अथवा अपने ट्यूमर मार्करों में असामान्यता के कारण वे अपनी सेहत सँभालना और ख़ुद से प्रेम करना शुरू करते हैं, और उनके तन-मन की दशा बदल जाती है। ये सब दुख की पराकाष्ठा के बाद सुख के लौटने के उदाहरण हैं।
एडलर के मनोविज्ञान पर आधारित “नापसंद किए जाने का साहस” बहुत लोकप्रिय है। वह साहस, जीवन-प्रश्नों और वर्तमान की ही बात करती है।