मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

झुआंगज़ी शृंखला

च्वांग-त्सु का ‘शरद का जल’: मनुष्य जल जैसा है, निराकार, रंगहीन और स्वभाव से शून्य—मनुष्य और प्रकृति की एकता

च्वांग-त्सु का ‘शरद का जल’: मनुष्य जल जैसा है—निराकार, रंगहीन, स्वभाव से शून्य; प्रकृति और मनुष्य का एकत्व

दोपहर को जब मन में उलटे-सीधे खयाल चल रहे थे, तभी अचानक ध्यान आया—अरे, मैं कुछ और भी तो सोच सकता हूँ। मैं यह भी सोच सकता हूँ कि ऑस्मैंथस के पेड़ कितने सुगंधित हैं, मैं देख सकता हूँ कि आसमान के बादल कितने सुंदर हैं। आज नीला आसमान है, सफेद बादल हैं। फिर नदी किनारे मुझे अपनी वह स्वर्ग जैसी जगह मिल गई। पानी को देखना, बस देखते रहना, कितना अच्छा लगता है। फिर खयाल आया कि कितने ही पहुँचे हुए लोग भी ऐसे ही बैठकर पानी को देखते रहे हैं।
फिर लगा कि “तुम मछली नहीं हो, तो कैसे जानते हो कि मछली आनंदित नहीं है?” वाली बात च्वांग-त्सु की भावना से बिल्कुल मेल नहीं खाती। अगर सामने वाला मछली के आनंद को महसूस ही नहीं कर सकता, तो च्वांग-त्सु उसे भाव ही नहीं देते, उससे यह बात कहते ही नहीं; और बाद में उसके बहस छेड़ने पर उससे तर्क-वितर्क तो और भी नहीं करते।

च्वांग-त्सु का ‘शरद का जल’: मनुष्य जल जैसा है—निराकार, रंगहीन, स्वभाव से शून्य; प्रकृति और मनुष्य का एकत्व
जल निराकार है, रंगहीन है, स्वभाव से शून्य है। पात्र उसे आकार देता है, रंग उसे रंग देता है।
जिन लोगों को अपनी आसक्तियों का बोध नहीं होता, वे पात्र और रंग के सहारे अपनी परिभाषा गढ़ते हैं। वे खुद को हरा पानी, नदी का पानी, समुद्र का पानी या सोडा वाटर मान लेते हैं और उसी पर गर्व करते हैं। वे अपनी पहचान, पेशे और भूमिका से तादात्म्य कर लेते हैं।
‘च्वांग-त्सु’ के ‘शरद का जल’ अध्याय में यही बताया गया है कि शरद का जल कितना आत्ममुग्ध था; समुद्र को देखने पर ही उसे अपने उथलेपन का पता चला। ठीक वैसे ही जैसे हम जवानी में छोटे कस्बों से आए, परीक्षा के सवाल हल करने में माहिर लोग, किसी नामी संस्थान में पहुँचकर और कुछ किताबें पढ़कर खुद को अभिजात मानने लगते हैं, फूले नहीं समाते। फिर जब कहीं बड़ी दुनिया देखते हैं, तभी अपनी सीमित समझ का एहसास होता है।
जब यह बोध हो जाता है कि अपना स्वभाव शून्य है, तो उन रंगों और आकारों से आसक्ति नहीं रहती। उनका अपने से कोई लेना-देना नहीं रह जाता। फिर अपने लिए कोई परिभाषा या बंधन नहीं रहता। भाप बनकर बादल हो सकते हैं, जमकर बर्फ के फाहे बन सकते हैं और आसमान में उड़ सकते हैं; ठोस बर्फ बनकर तियानशान के पहाड़ों में संचित रह सकते हैं; कीचड़ भरे तालाब में होने को भी स्वीकार कर सकते हैं। यह सब बस जिस परिस्थिति में हों, उसी में सहज रहने की बात है।
पहली बात, परिस्थितियों में और सहज रहना—न प्रतिरोध करना, न बेवजह उथल-पुथल मचाना, न आसक्ति रखना।
दूसरी बात, और अधिक निर्मल बोध, और अधिक शांति। मन का स्वभाव शांत हो, प्रकृति और मनुष्य एक हों।
लोग पात्र, रंग और आकार से अपनी पहचान क्यों जोड़ना चाहते हैं? अस्तित्ववादी मनोविज्ञान इसे समझने की एक दिशा देता है। जिनका भीतरी आधार बहुत कमजोर होता है, उन्हें अपने अस्तित्व का एहसास करने के लिए इन चीजों की जरूरत होती है। जिनका भीतरी आधार स्वस्थ होता है, वे सहज ही, जल की तरह, बिना किसी शर्त के अस्तित्व में रह सकते हैं।