मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

कर्मजनित बाधाओं की शृंखला

साधारण होने को स्वीकारना

साधारणता का सामना करना बहुत-से लोगों के लिए कठिन होता है। 1. बाहर से पाने की चाह साधारणता को स्वीकार नहीं कर पाती, 2. “आसपास के लोग” साधारणता को स्वीकार नहीं कर पाते, 3. नौकरी की तलाश में साधारणता स्वीकार नहीं की जाती, 4. अस्तित्वगत संकट साधारणता को स्वीकार नहीं कर पाता, 5. छोटे अहं की तरह-तरह की आसक्तियाँ साधारणता को स्वीकार नहीं कर पातीं। पहले अपने बच्चों और भतीजे-भतीजियों की सामान्यता और साधारणता को स्वीकार न कर पाना भी भीतर की चिंता का प्रक्षेपण था।

एक, स्वीकार करना

अपनी सीमितता को स्वीकार करना, बाहरी भाग्य को स्वीकार करना, भीतर के हर सच, हर चुनौती और हर अँधेरे पक्ष को स्वीकार करना। समावेश की क्षमता से ही विशालता आती है। अहं दूर चला जाता है, बाहर से आए आख्यान दूर चले जाते हैं।

दो, अतीत के साधारण दिन अब अनमोल लगते हैं

अब भी सहज पूर्णता दिखाई देती है। उसी में तो मैं जी रहा था। एक और लेख है, “हम हमेशा अपने अतीत के स्व के साथ मिलकर लड़ते आए हैं”।

तीन, अतीत के साधारण रिश्तों को लेकर मन की गाँठ खोलना

सोचता हूँ, मैं शुरू से ही एक सामान्य, बल्कि साधारण इंसान रहा हूँ, ऐसा कोई नहीं जिस पर खास ध्यान दिया जाए। अतीत के कुछ लोगों का मेरे प्रति जो रवैया था, उसे लेकर पहले मेरे मन में लोभ, क्रोध, मोह और शिकायत थी, लेकिन सोचूँ तो वह भी अहं का ही उभार था। सामान्य लोग अकेले होते हैं, साधारण लोग स्वाभाविक रूप से और भी अकेले होते हैं। मैं उन्हें “भावनाओं को महत्त्व न देने” के लिए नापसंद करता था, लेकिन यह भी तो “भावनाओं” के सहारे रिश्तों को अपने पक्ष में बनाए रखना और दूसरों को बाँधना था—एक साधारण चाल, जो स्वाभाविक रूप से टिकाऊ नहीं होती।

साधारणता अच्छी नहीं है, लेकिन शर्मनाक भी नहीं है। यह दुनिया आम, सामान्य लोगों के प्रति मैत्रीपूर्ण नहीं है। अज्ञान में जीने वाले लोगों को अपनी रक्षा के लिए ओछेपन का सहारा लेना पड़ता है; इससे बचना कठिन है। बस, जब तात्कालिक युक्ति ही दीर्घकालिक रणनीति बन जाए और ओछापन ही केंद्र बन जाए, तब सब बिगड़ जाता है।

जीवन के दूसरे हिस्से में सामान्य होने, लेकिन औसतपन में न डूबने की कोशिश करना ही इस बात का संकेत है कि मुझमें कुछ समझ आ गई है।

चार, साधारणता मुझे सुकून देती है

पहले जब मन अशांत होता था, तो मैं खुद को हौसला देने के लिए हमेशा उन पलों को याद करता था जब मैं सबसे अलग, उत्कृष्ट या विशेष रहा था। अब यह सोचकर कि मैं कितना साधारण हूँ, मुझे सुकून मिलता है। साधारणता को स्वीकार करने से मुझे सुकून मिलता है। मैं प्रकृति की एक सामान्य वस्तु हूँ, एक सामान्य अस्तित्व—सहज रूप से आता हूँ, सहज रूप से चला जाता हूँ।

  1. साधारण इंसान होकर खुद को व्यर्थ परेशान न करना ही सामान्य होना है, औसतपन में डूबना नहीं।
  1. मुझ पर न नियति का कोई ऋण है, न किसी और का, न अपना।
  1. मेरे ऊपर कोई कार्यभार नहीं है। मुझे जान-बूझकर कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। मैं बस एक बहुत साधारण इंसान हूँ, जिसे भाग्य हमेशा आगे धकेलता आया है। जब मैं शांत हो जाऊँ और बेतरतीब हाथ-पाँव मारना छोड़ दूँ, तभी भाग्य की नदी के प्रवाह का आनंद ले सकता हूँ।
  1. मेरा कोई दोष नहीं है, मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है।