मार्क्स और च्वांग-त्सु से मध्यजीवन संकट का सामना: विश्वदृष्टि, जीवनदृष्टि और मूल्यों के घटिया कोड के ढेर को फिर से गढ़ना
नोट: “मल का पहाड़” जैसे उलझे और बदहाल कोड तथा कोड की पुनर्संरचना, आईटी और इंटरनेट उद्योग में आम घटनाएँ और प्रचलित शब्द हैं। विकास के शुरुआती दौर में प्रोटोटाइप को जल्द-से-जल्द चलाने की कोशिश होती है; इस दौरान कोड की संरचना और तकनीकी स्टैक में बहुत-सी समस्याएँ जमा हो जाती हैं, जिन्हें बीच और बाद के चरणों में सुधारकर पुनर्संरचित किया जाता है। यह युद्धकाल में आपात आवश्यकता के लिए बनाए गए नावों के पुल की तरह है, जिसकी जगह शांतिकाल में इस्पात का बड़ा पुल बनाया जाता है।
पूर्वी एशिया के युवा 12–30 वर्ष की उम्र तक, माध्यमिक विद्यालय से स्नातकोत्तर पढ़ाई और फिर नौकरी तथा विवाह के लिए मुलाकातों तक, लगातार अपने बाहर उत्तर और समाधान खोजते हैं, लगातार घातक टूर्नामेंट जैसी आपसी होड़ में पिसते हैं, लगातार ठोकरें खाते और बेहाल होते रहते हैं। जिस परिवार में वे पले-बढ़े, जिन शिक्षण संस्थानों में पढ़े और जिन कार्यस्थलों से उनका सामना हुआ, वहाँ तनाव और आघात लगातार जमा होते रहते हैं। इस पूरे सफर में विश्वदृष्टि, जीवन-दृष्टि और मूल्य-दृष्टि अस्पष्ट बनी रहती हैं; जहाँ समस्या दिखी, वहीं किसी तरह छेद बंद कर दिया, खून रोक दिया, पैबंद लगा दिया। तरह-तरह के मनोवैज्ञानिक रक्षा-तंत्र, क्षुद्र अहं, व्यक्तित्व के खंड, व्यक्तित्व के मुखौटे, मिथ्या स्व आदि से जुड़े कर्मगत अवरोध, अंतर्विरोध और टकराव लगातार जमा होते जाते हैं, और इन तीनों दृष्टियों तथा संज्ञान का तंत्र मल के पहाड़ जैसे बदहाल कोड की तरह ढेर होता जाता है।
30 वर्ष की उम्र में आने वाले मध्यजीवन संकट का एक कारण सामाजिक घड़ी है: जीवन के चौराहे पर आ पहुँचना—तय पटरी पर टिके रहना या उससे उतरकर खुले अनजाने विस्तार में जाना। मृत्यु की छाया भी सामने आने लगती है, और अस्तित्वगत संकट की गंभीर चुनौती खड़ी होती है। दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक घड़ी है: एक ओर आप इतने मजबूत हो चुके होते हैं कि बहुत-से सत्यों का सीधे सामना कर सकें और बहुत-से संबंधों तथा व्यवहार के ढर्रों को नए सिरे से व्यवस्थित कर सकें; दूसरी ओर आपकी विश्वदृष्टि, जीवन-दृष्टि, मूल्य-दृष्टि और संज्ञान के तंत्र का वह मल का पहाड़ अब किसी तरह भी चल नहीं पाता और बार-बार खराब होने लगता है। एक आम उदाहरण: इतिहास को जनता की दृष्टि से समझें या महानायकों की दृष्टि से? जिस सामाजिक डार्विनवाद और अभिजनवाद का सहारा लेते हुए अब तक चले थे, वही बूमरैंग बनकर खुद को चुभने लगते हैं। (पिछला लेख: “इंसान केवल किस्मत साथ देने और सत्ता-प्रभाव मिलने के समय ही सामाजिक डार्विनवादी और अभिजनवादी नहीं हो सकता: बड़ी टेक कंपनियों के प्रोग्रामरों और वित्तीय केंद्रों में काम करने वालों में आम तौर पर दिखने वाली एक प्रवृत्ति।”) युंग का कहना कि असली जीवन 40 वर्ष की उम्र से शुरू होता है, जागरण और स्वयं को नए सिरे से गढ़ने के इसी दृष्टिकोण से है।
विश्वदृष्टि, जीवन-दृष्टि, मूल्य-दृष्टि और संज्ञान के तंत्र के कोड को बेहतर बनाने और पुनर्संरचित करने के लिए उन्नत, विवेकपूर्ण वैचारिक और दार्शनिक प्रणालियाँ चुननी होंगी: यानी मार्क्सवादी सामाजिक विज्ञान की प्रणाली और च्वांग-त्सु के जीवन तथा जीवन-यापन के दर्शन की प्रणाली। (अब तक मौजूद मार्क्सवादी प्रणाली का जोर समाजशास्त्र, राजनीति, इतिहास आदि पर रहा है; मनोविज्ञान, जीवन और जीवन-यापन के दर्शन के क्षेत्र में कुछ जगह खाली रह गई है। इसके ऐतिहासिक कारण हैं। मार्क्स की 1844 की पांडुलिपियाँ और एंगेल्स की “परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति” आदि ठोस शुरुआती आधार हैं। इसलिए इसकी पूर्ति के लिए च्वांग-त्सु की अपेक्षाकृत उन्नत दार्शनिक प्रणाली का सहारा लेना होगा। च्वांग-त्सु का दर्शन एपिक्यूरस के दर्शन के करीब है; यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है।)
अर्थात विकास की वामपंथी दिशा: मार्क्स, च्वांग-त्सु और मनोविज्ञान के सहारे संज्ञान का पुनर्निर्माण करना; निचले तबके के श्रमजीवी वर्ग की सहज सच्चाई, अच्छाई और सुंदरता तथा प्रकृति की शांति और सुंदरता से जुड़ाव बनाना; समाज, इतिहास और विश्व से जुड़ाव बनाना; और इस तरह स्व–अन्य लोग–समाज–विश्व के बीच मनुष्य और प्रकृति की एकात्मता तथा सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व तक पहुँचना। साइबरपंक संसार में अलग-अलग परमाणुओं की तरह बिखरे, छोटे और अति-छोटे पूँजीपति व्यक्तियों के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से स्वयं को उबारने का भी यही अपरिहार्य मार्ग है।