जीवन लावे जैसा है—उसमें प्रकाश और लपटें झिलमिलाती हैं
यह जीवन हरगिज़ कोई स्याह, मामूली कोयले का गोला नहीं है।
यह बहता हुआ, काला-लाल लावा है, जिसके भीतर प्रकाश और ज्वालाएँ झिलमिलाती हैं, जिसके प्रकाश को रोका नहीं जा सकता।
मेरी मूल प्रकृति का प्रकाश हमेशा आगे बढ़ते हुए मेरा पथ आलोकित करता है, मुझे पोषण देता है।
जीवन अक्सर पीड़ादायक और असह्य होता है, कर्मगत अवरोध अक्सर गहरे होते हैं, फिर भी मैं अपनी देखभाल कर पाता हूँ, कभी-कभी शांति भी पाता हूँ। क्या यही मेरे मूल स्वरूप की शक्ति को नहीं दर्शाता?
पहले मैं प्रकाश खोजता था, अब जाना कि मैं स्वयं ही वह प्रकाश हूँ।
मन ही बुद्ध है, मैं ही प्रकाश हूँ।