कठोर पराहम् और खुद पर हमले की समस्या कैसे सुलझाएँ
कठोर पराहम् और आत्म-आक्रमण का समाधान कैसे करें
एक、कठोर पराहम् और आत्म-आक्रमण की जड़ क्या है?
- कोहुट:
a. स्व की ज़रूरतें पूरी न होना, स्व का ढहना, आत्ममोहजनित प्रचंड क्रोध, जो बाहर की ओर व्यक्त नहीं हो पाता और स्वयं की ओर मुड़ जाता है। (आत्ममोह को चोट पहुँचना, असमर्थता का प्रचंड क्रोध)।
b. रक्षा-तंत्र: असहायता की अनुभूति से बचना और आत्म-आक्रमण के माध्यम से नियंत्रण की अनुभूति प्राप्त करना। - विनिकॉट:
a. ऑब्जेक्ट-संबंधों में निराशा के कारण भावनात्मक ऊर्जा (लिबिडो) का वापस खिंच जाना, जिससे आत्म-अलगाव या आत्म-आक्रमण पैदा होता है।
b. भीतर समा गए विषाक्त ऑब्जेक्ट; बाहरी दुनिया (माता-पिता) को संतुष्ट करने के लिए विकसित मिथ्या स्व, जिसके केंद्र में स्वीकार न किए जाने की लज्जा है और जिसका संबंध युंग के “व्यक्तित्व के मुखौटे” से है; इन दोनों को अक्सर “भीतर के कठोर माता-पिता” के रूप में महसूस किया जाता है।
c. संबंध बनाए रखना: आत्म-आक्रमण के माध्यम से ऑब्जेक्ट के साथ जुड़ाव बनाए रखना (“छोड़ दिए जाने से दंडित होना बेहतर है”)। - हॉर्नी:
a. बुनियादी चिंता, न्यूरोटिक प्रवृत्तियाँ, दोष स्वयं पर डालना -> स्व के विघटन और हीनता का पीड़ादायक अनुभव। आत्ममोह और आदर्श स्व को ठेस लगना, स्व के भीतर तनाव, अपने ऊपर आक्रमण को जन्म देते हैं; आत्ममोह–हीनता–आत्मघृणा की त्रयी।
b. कठोर पराहम्, भीतर समा चुका “चाहिए” का अत्याचार। - फ़्रायड: कठोर पराहम्, भीतर समा चुकी सत्ता; आत्मविनाशकारी मृत्यु-वृत्ति।
- लाकाँ: प्रतीकात्मक व्यवस्था की हिंसा और बृहद् अन्य की निगाह।
- शर्तों पर मिलने वाला प्रेम, दूसरों को खुश रखने वाला व्यक्तित्व।
मिथ्या स्व की तरह, यह भी कठोर परिवार में बच्चे द्वारा अपने आप विकसित की गई जीवित रहने की रणनीति है। यह अक्सर सहजीवी संबंधों और आत्ममोह से जुड़े मुद्दों के साथ मिलकर “उद्धारकर्ता व्यक्तित्व” का रूप ले लेती है। साथ ही, अक्सर लिबिडो की आक्रामकता बाहर व्यक्त नहीं हो पाती और केवल भीतर, स्वयं की ओर मुड़ सकती है, जिससे कठोरता और बढ़ती है। इसलिए मनोविज्ञान की कई धाराएँ माता-पिता को बचाने की कोशिश छोड़ने, दूसरों की नियति में हस्तक्षेप छोड़ने, परिवार के कर्मबंधनों में उलझना छोड़ने और अपनी व दूसरों की ज़िम्मेदारियों को अलग करने की बात करती हैं। - सामाजिक अलगाव, साधन बना दिया जाना, समाजीकरण, अलगाव, सामाजिक दबाव का भीतर समा जाना; जीविका कमाने के लिए लोगों को जूते में पैर फिट करने की खातिर पैर काटने जैसा समझौता करना पड़ता है।
अन्य…
दो、आम मुद्दों का समाधान - एकल मूल्य-व्यवस्था, समाज द्वारा तय जीवन की समय-सारिणी -> बहुल मूल्य-व्यवस्था।
- “शर्तों पर मिलने वाले प्रेम” के मुद्दे को पहचानना;
इसकी जड़ बचपन से मूल परिवार द्वारा अनुशासित किए जाने, साधन बना दिए जाने, दूसरों को खुश रखने वाले व्यक्तित्व और माता-पिता को बचाने वाले उद्धारकर्ता व्यक्तित्व में है। जीवन में मौजूद “बिना शर्त प्रेम” को पहचानना: प्रकृति, सर्वहारा, पालतू जानवर। - संबंधों से जुड़े मुद्दे, ऑब्जेक्ट-संबंध: सामाजिक संबंधों को छाँटना, उन लोगों के करीब रहना जो आपको फलने-फूलने दें और उनसे दूर रहना जो आपको दबाएँ; लोगों को चुनने में सख्त और अपने प्रति उदार रहें। रोजर्स का “सहायक संबंध”।
- (शुरुआती तौर पर) बिना शर्त आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और सहजता का अनुभव करना।
- अन्य, विभिन्न प्रकार के आघात से जुड़े मुद्दे।
तीन、भीतरी आधार को मज़बूत करना - विषाक्त लज्जा
《आत्म-आक्रमण, आत्म-संशय और विषाक्त लज्जा की जड़ क्या है》 में विषाक्त लज्जा पर अपेक्षाकृत व्यवस्थित चर्चा की गई है: लज्जा कोई सामान्य भावना नहीं है, जैसा लोग ग़लती से मान लेते हैं; यह एक गंभीर आघात है।
a. शुरुआती लगाव का आघात और प्रतिबिंबन की विफलता
बच्चे की बुनियादी ज़रूरतों को देखभाल करने वालों द्वारा ठुकरा दिया जाता है या उनका अपमानजनक उत्तर दिया जाता है। बच्चा इस नकार को “मेरा अस्तित्व ही ग़लत है” वाली लज्जा के रूप में अपने भीतर बसा लेता है। “मैं, मैं हूँ” इसी बात पर लज्जित होना। (एक प्रकार का अस्तित्वगत आघात—शुरुआती संबंधों में व्यक्ति को “मनुष्य” के रूप में बुनियादी स्वीकृति नहीं मिल पाती। गहरे अस्तित्ववादी संकट के स्तर का आत्म-निषेध।)
b. आत्ममोहजनित आघात और स्व का विघटन
आत्ममोहजनित आघात में स्व के बिखर जाने का अनुभव होता है। और दो प्रकार के रक्षा-तंत्र पैदा होते हैं: a. अतिरंजित स्व (लज्जा को ढकना, जैसे अत्यधिक आत्ममोह); b. आत्ममोहजनित अवसाद (“मेरा कोई मूल्य नहीं है” वाली लज्जा में फँस जाना)।
c. प्रक्रियाओं की शृंखला
पहले गहरी पीड़ा का अनुभव होता है, फिर उसके सिलसिलेवार परिणाम और कई रक्षा-तंत्र सामने आते हैं: पीछे हटना, आत्म-आक्रमण और आत्मविनाश, आत्म-संशय तथा टालमटोल पैदा करने वाला पूर्णतावाद, श्रेष्ठता का मिथ्या बोध। लंबे समय तक बनी रहने वाली लज्जा भावनात्मक वियोजन का कारण बन सकती है। - आसानी से वियोजित या विचलित न होना, आत्ममोह को आसानी से चोट न पहुँचना
तब लिबिडो के वापस खिंचने से पैदा होने वाले आत्म-आक्रमण की तीव्रता बहुत अधिक नहीं होती। - आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की स्थिरता, आत्म-पुष्टि, दृढ़ विश्वास आदि के माध्यम से अपने अस्तित्व की पुष्टि;
बाहरी मूल्यांकन के कारण अत्यधिक पीड़ा न होना। - अहं के विभिन्न रूपों, आसक्तियों, लोभ, द्वेष और मोह को बड़े पैमाने पर आत्मसात करके सुलझाना
《कर्मगत अवरोध पर विशेष चर्चा》《वास्तविक स्व का लिबिडो के साथ रहना》《मन की शक्ति/लिबिडो नियति निर्धारित करती है》
चार、अस्तित्ववादी उपचार - सुरक्षा
सुरक्षा का अनुभव, सुरक्षा-बोध में वृद्धि; बुनियादी चिंता कम करना;
पहले का लेख 《जहाँ यह मन सुरक्षित है, वहीं मेरा घर है: अशांति से असंख्य दानव जन्मते हैं, मन की शांति से असंख्य मार्ग》। - उपस्थित होना, सहज होना
बिना शर्त अच्छा होना, बिना शर्त अस्तित्व-बोध।
पहले का लेख 《उपस्थित होना और सहज होना अस्तित्ववादी संकट का उत्तर हैं》। - गहरे जुड़ाव की अनुभूति, प्रकृति और मनुष्य की एकता का अनुभव, (शुरुआती तौर पर) इदम् की शांति और सहज पूर्णता का अनुभव करना
सचेतनता, प्रवाह-अवस्था, सत्य, अच्छाई और सौंदर्य के अनुभव।
《आम लोग सहज पूर्णता का अनुभव कैसे करें》
चार、मार्क्स, च्वांग-त्सु - व्यक्ति की सीमाएँ बनाम ऐतिहासिक भौतिकवाद, प्रकृति के नियम
व्यक्ति की सीमाओं को गहराई से समझना। सीमितता को स्वीकार करना, असमर्थता और अकर्म।
《व्यक्तिगत असफलता का सहजता से सामना करना कठिन नहीं है: इतिहास के अवनति-काल का सहजता से सामना करना》 - अनुपयोगिता की उपयोगिता
तैरती मछलियाँ और तितलियाँ, निश्चिंत और मुक्त। “उपयोगी होना”, अलगाव और वस्तुकरण।
《च्वांग-त्सु · तिलचट्टे पर विचार: तिलचट्टों को करोड़ों वर्षों तक अस्तित्व में रहने के लिए अर्थ की ज़रूरत नहीं पड़ी, मनुष्य को भी नहीं है》 - साधारणता को स्वीकार करना
《साधारणता को स्वीकार करना》 अपेक्षाकृत ऊँची माँग है। अस्तित्ववादी प्रश्नों पर अभ्यास एक निश्चित स्तर तक पहुँचने पर ही यह संभव होता है। अन्यथा अपनी साधारणता का सामना करना कठिन है। - च्वांग-त्सु के आठ अभाव: अहं का अभाव, आसक्ति का अभाव; सामर्थ्य का अभाव, कर्म का अभाव; इच्छा का अभाव, माँग का अभाव; चिंता का अभाव, फ़िक्र का अभाव
बिना शर्त आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और सहजता, सहज पूर्णता, इदम् की शांति।
पाँच、उपर्युक्त बातों के आधार पर, कठोर पराहम् के मुद्दे का समाधान अपेक्षाकृत बाद के चरण में आता है; इसके लिए भीतरी आधार, कर्मगत अवरोध और विश्वदृष्टि, जीवन-दृष्टि व मूल्य-दृष्टि में समग्र विकास की आवश्यकता होती है।
परिशिष्ट:
मृत्यु का मुद्दा भी कठोर पराहम् के मुद्दे जैसा है; यह अपेक्षाकृत बाद के चरण का मुद्दा है। विभिन्न बुनियादी मुद्दों को क्रम से सुलझाने पर यह स्वाभाविक रूप से हल्का पड़ेगा और सुलझेगा। इसके बाद 《शैक्षिक योग्यता को लेकर हीनभावना कैसे दूर करें》 भी इसी तरह का है। देखने में सरल लगने वाले इन प्रश्नों के पीछे पूरी विश्वदृष्टि, जीवन-दृष्टि और मूल्य-दृष्टि का पुनर्निर्माण तथा भीतरी आधार का उपचार जुड़ा है। इसलिए मार्क्स + च्वांग-त्सु + मनोविज्ञान की व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण है।