मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

कर्मजनित बाधाओं की शृंखला

लोग रोज़ “साधना के विपरीत” जीवन जीते हैं—अनुभूतियों की उलझन

अनुभूतियों के संपर्क में रहना, सचेतनता और स्वच्छ सहजता—ये साधना की जीवन-शैली हैं। लेकिन लोग रोज़मर्रा में अपनी अनुभूतियों की उलझन बढ़ा रहे हैं, बिखरे विचारों में डूब रहे हैं और बुरी आदतें व संस्कार पाल रहे हैं। वे “साधना के विपरीत” जीवन जी रहे हैं।

सामाजिक संबंध: घटिया, उलझे हुए और विकृत भावनात्मक रिश्तों में डूबे रहना; खाने-पीने के यार, एक-दूसरे की भावनात्मक कूड़ेदानी बनने वाले साथी, मन से बेवफ़ाई, आकस्मिक यौन मुलाक़ातें और अंधाधुंध यौन संबंध; बनावट, लिजलिजापन, उलझन और विकृति। इस हद तक कि अच्छे रिश्तों को पहचानना और चुनना ही संभव न रहे।

पढ़ाई: घमंड, हीनभावना और आत्मसंदेह का घालमेल; कल्पनाएँ, अहं, अतीत में उलझना और भविष्य की चिंता। पढ़ा तो एक पन्ना, मगर मन में दो धारावाहिक चलते रहे।

कामकाज: काम करने की घटिया आदतों और घटिया कार्य-माहौल का आदी होना; हेराफेरी, गड़बड़ी का फ़ायदा उठाकर कामचोरी, चापलूसी, ऊपर वालों की जी-हुज़ूरी और नीचे वालों पर धौंस। “झेन हुआन की कथा” जैसी दरबारी साज़िशों में इस कदर डूब जाना कि निकल न सकें, और हुनर व चरित्र दोनों खो बैठें। कल्पनाएँ, अहं, दूसरों की मानसिक ऊर्जा चूसना। निराशा में गिरकर पस्त हो जाना।

शरीर: जीने की घटिया आदतों का आदी होना; देर रात तक जागना, ठूँसकर खाना, जंक फ़ूड, व्यायाम की कमी, खेलों और फ़ोन पर स्क्रॉल करने में हद से ज़्यादा डूबना। थकान और अपनी क्षमता से ज़्यादा ख़र्च हो जाने की हालत में फँस जाना।

मन: उलझन, अपनी अनुभूतियों पर भरोसा न कर पाना, ज़रूरत से ज़्यादा सोचना, हीनभावना, घमंड, ख़ुद पर हमला और आत्मविनाश। भीतर से चुक जाने, दिशाहीनता, उदासी और निराशा में फँस जाना।

लोग किसी नशे में धुत कलाबाज़ जैसे हैं—हड़बड़ाते, हाथ-पाँव मारते, पाँच-छह गेंदें उछालते हुए तनी रस्सी पर चल रहे हैं। सब “अपने दिल की सुनो”, अपनी अनुभूतियों का अनुसरण करो जैसी बातें जानते हैं, लेकिन दिल अंधा है और नशे की ख़ुमारी बाकी है। अंधा सवार, अंधा घोड़ा, आधी रात और अथाह खाई।

साधना के विपरीत चलना सबसे पहले “शुरुआती परिवेश” से शुरू होता है—वह परिवार, विद्यालय और कार्यस्थल जहाँ हमारी शुरुआती ढलाई हुई। यहीं से बच्चे की सहज पूर्णता, अनुभूतियों, सहज वृत्ति और अंतर्ज्ञान, सादगी और अपने सहज स्वभाव के अनुरूप रहने, स्वच्छ सहजता और हल्केपन से दूरी बनने लगती है।

साधना के विपरीत चलना, भीतर अँधेरा छाने की शुरुआत है। बुरे लोग भी तो अधिकतर आम लोगों से ही बने होंगे। इसका पहला प्रमाण यह है कि वे सब जन्म से ही ऐसे तो नहीं हो सकते। दूसरा, इक्कीसवीं सदी अठारहवीं सदी से बहुत बेहतर है, और भविष्य का अंतरराष्ट्रीय समाज आज से बहुत बेहतर होगा। बुरा बनने का पहला क़दम ही “साधना के विपरीत चलना” है।

सत्य की साधना, भ्रम का भेदन: साधना-विरोध का प्रतिरोध, परम सादगी, महान सत्य, स्थिरता और अकृत्रिम सरलता।

पुनश्च: यह लिखने का प्रसंग। इन वर्षों में हर जगह साधना के विपरीत जीवन के अवशेष और अनुभूतियों की उलझन दिखाई देती रही है। साथ ही, साधनामय जीवन की परम सादगी, स्वच्छ सहजता, सचेतनता और ऊँची आवृत्ति भी अक्सर महसूस होती रही है। अंतर स्पष्ट है। बोध अचानक होता है, साधना धीरे-धीरे; जमी हुई आदतें छूटना कठिन है। वास्तविक साधना जारी रहे, प्रगति जारी रहे।