स्वाभाविकता—प्रश्न—उत्तर का चक्र
स्वाभाविकता–प्रश्न–उत्तर का चक्र।
सही मार्ग पर चलने से पढ़ाई, करियर, सामाजिक मेलजोल और तन-मन के क्षेत्र में वर्तमान के अच्छे प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, और फिर अच्छे उत्तर भी स्वाभाविक रूप से उभरते हैं।
यही प्रकृति के प्रवाह के साथ चलने, ज़ोर लगाते ही चूक जाने और वर्तमान में जीने का व्यावहारिक आधार है।
प्रश्नों और उत्तरों के उभरने में ज़ोर लगाते ही चूक हो जाती है; प्रयास व्यर्थ है। सब कुछ अपने मूल स्वभाव के प्रकाश पर निर्भर है।
अच्छे प्रश्न अच्छे उत्तरों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं; उन्हें पहचानने के लिए स्वाभाविक और निर्मल होना ज़रूरी है।
इस तरह निरंतर विकसित होते रहना। निरंतर वर्तमान में जीना, स्वाभाविक रूप से। हर कदम पर पूर्णता, हर कदम पर आगे बढ़ना। हर कदम पर प्रवाह के साथ बहना, हर कदम पर हवा पर सवार होना।
मेरे स्वाभाविकता–प्रश्न–उत्तर के चक्र को क्या रोक रहा है?
लोग अक्सर अज्ञान में रहते हैं और मुख्य अंतर्विरोध से जुड़े प्रश्न को नहीं पहचानते।
मेरे मुख्य प्रश्न को क्या रोक रहा है, काम की दिशा खोजने की मेरी कोशिश को क्या रोक रहा है, असाधारण और प्रथम श्रेणी के लोगों तथा मनुष्य के विकास के स्तरों पर मेरे चिंतन को क्या रोक रहा है? कर्मगत अवरोध।