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मार्क्स शृंखला

शंघाई का गौरव कभी निम्न-मध्यवर्ग नहीं रहा

हाल ही में पटकथा लेखक गु एर और वोंग कार-वाई की ‘ब्लॉसम्स शंघाई’ की निर्माण टीम के बीच संघर्ष ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी है। इसने लोगों के सामने फ़िल्म और टेलीविज़न के सांस्कृतिक कर्मियों तथा पटकथा लेखकों के जीवन की वास्तविक परिस्थितियाँ और निम्न-मध्यवर्गीय तबके की वास्तविक कार्यस्थितियाँ उजागर कर दी हैं। आज़ादी, कला और मानविकी के निम्न-मध्यवर्गीय दिखावे की आड़ में बेलगाम शोषण, आश्रितता, यौन उत्पीड़न और सामंती व्यवस्था मौजूद हैं। ‘ब्लॉसम्स शंघाई’ धारावाहिक शंघाई की जिस संस्कृति का गुणगान करता है—“सलीका, अंदाज़, अनुबंध, वचनबद्धता और चुप्पी”—उसके चकाचौंध भरे फ़िल्टर के नीचे, शंघाई की वास्तविक निर्माण टीम में स्थिति ठीक उलटी दिखाई देती है।

हाल के वर्षों में ऐसा लगता है कि शंघाई के “गौरव” का प्रतिनिधित्व पूरी तरह निम्न-मध्यवर्गीय चीज़ों ने अपने हाथ में ले लिया है: संस्कृति, कला, अंदाज़, ऊँचे दर्जे का दिखावा, उच्च प्रौद्योगिकी वगैरह। यहाँ तक कि इस तबके के लोग अपने शास्त्रीय उदारवाद के दौर, यानी मुक्ति से पहले के पुराने शंघाई को “याद” करने लगे हैं—ग्रीन गैंग के गुंडे “श्री दू” के “जान-पहचान, रुतबे और लिहाज़” को, विदेशी रंग-ढंग वाले उस चकाचौंध भरे महानगरीय इलाके को, विदेशी रियायतों में बड़ी व्यापारिक कंपनियों के साहबों को। ये श्री दू अफ़ीम के व्यापारी थे, और उनके रुतबे का प्रदर्शन था सबके सामने ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या करना। यदि शंघाई महज़ अफ़ीम की ख़रीद-फ़रोख़्त करने वाला एक ऐसा मुक्त व्यापार बंदरगाह होता जहाँ कोई व्यवस्था न हो या सिर्फ़ अपराध-जगत की व्यवस्था हो, तो वह हांगकांग से कुछ अलग नहीं होता।

पुराने शंघाई में निम्न-मध्यवर्ग ने एक दिन भी इंसानों जैसा जीवन नहीं जिया था। उनका पुराने शंघाई को याद करना बेहद हास्यास्पद है; उन्होंने विरासत में सिर्फ़ सामाजिक डार्विनवाद, दूसरों से होड़ और सत्ताधारी अभिजात वर्ग के मोह में उसका पिछलग्गू बनना पाया है। पुराने शंघाई की एकमात्र रोशनी मज़दूर वर्ग था, लेकिन अपराध-जगत और सरकारी सत्ता के संयुक्त कार्रवाई दस्तों ने उसे कुचल दिया, बिल्कुल यूरोप के नाज़ी कार्रवाई दस्तों की तरह। उसी तरह, जैसे छिंग सेना ने ब्रिटिश और फ़्रांसीसी सेनाओं के साथ मिलकर लघु तलवार संघ पर हमला किया था।

शंघाई का गौरव लघु तलवार संघ का विद्रोह, ‘नवयुवा’ पत्रिका, लू शुन, 30 मई आंदोलन, कम्युनिस्ट पार्टी की पहली कांग्रेस, मज़दूर पिकेट दस्ते, कमर्शियल प्रेस और लोंगहुआ शहीद स्मारक कब्रिस्तान हैं। वह मज़दूरों, किसानों, छात्रों और वामपंथी बुद्धिजीवियों के संघर्ष का इतिहास है। वह, जननायकों के स्मारक के शिलालेख के शब्दों में, वे जननायक हैं जिन्होंने अठारह सौ चालीस तक पीछे जाते हुए, तब से लेकर देशी और विदेशी शत्रुओं का विरोध करने, राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा जनता की आज़ादी और ख़ुशहाली हासिल करने के लिए हुए तमाम संघर्षों में अपने प्राण न्योछावर किए। ठीक वैसे ही जैसे पेरिस का गौरव निम्न-मध्यवर्ग की कला या वर्साय का महल नहीं, बल्कि फ़्रांसीसी क्रांति और पेरिस कम्यून हैं।

शंघाई में महिलाओं की ऊँची स्थिति और पुरुषों के खाना पकाने का कारण यह है कि नए चीन की स्थापना के बाद वहाँ कपड़ा उद्योग समेत अन्य उद्योग विकसित हुए और महिलाओं के रोज़गार की दर ऊँची रही। यह श्रमजीवी वर्ग की समान अधिकारों की जीत है, क्रांति से मिला लाभ है। पूर्वोत्तर चीन में बेटियों के मुक़ाबले बेटों को तरजीह देने की प्रवृत्ति बहुत गंभीर न होने का कारण भी यही है।

शंघाई में निम्न-मध्यवर्गीय सफ़ेदपोश लोगों की चैन-सुकून भरी ज़िंदगी के पीछे पूरे चीन की वामपंथी क्रांति का इतिहास, पूरा यांग्त्से डेल्टा, यांग्त्से का जलमार्ग और चीन की संपूर्ण औद्योगिक व्यवस्था खड़ी है—यानी निचले सामाजिक पायदान पर मौजूद एक अरब श्रमजीवी लोग।