जुड़ाव बनाम उलझाव: दुनिया के साथ संबंध
जुड़ाव बनाम उलझाव: दुनिया के साथ संबंध
एक, जुड़ाव का मनोविज्ञान: च्वांग-त्सु के मनोविज्ञान की कुंजी
जुड़ाव मन और अंतर्मन के अध्ययन का केंद्रीय बिंदु है, और च्वांग-त्सु के मनुष्य और प्रकृति की एकता के दर्शन का विस्तार भी है। मनुष्य–स्वयं–दूसरों–समाज–ब्रह्मांड के बीच प्रकाशमय जुड़ाव अस्तित्ववाद का उत्तर है। पिछले लेख: 《जुड़ाव कैसे टूटता है》, 《हम हमेशा जुड़ाव तलाशते रहे हैं》, 《प्रकृति से जुड़ना कठिन क्यों है》, 《जुड़ाव के नज़रिए से देखें तो जद्दोजहद करना ही चूक और ज़ोर लगाना ही कमी क्यों है》 तथा जुड़ाव शृंखला के अन्य लेख।
दो, संबंधों का मनोविज्ञान: कोहुट का स्व मनोविज्ञान और वस्तु-संबंध संप्रदाय
सहारा देने वाले इन दोनों प्रमुख वैचारिक ढाँचों की कुंजी संबंध ही है।
A. वस्तु-संबंध संप्रदाय: धारण करने वाला परिवेश, 60 अंकों वाली माँ (उचित मात्रा में कुंठा का अनुभव), आंतरिकीकृत वस्तु, मिथ्या स्व आदि। अस्वस्थ परिस्थितियों में, भीतर समा चुकी बुरी वस्तु (कठोर पराहम्/माता-पिता, “मैं अच्छा नहीं हूँ”) और मिथ्या स्व, सभी संबंध बनाए रखने के लिए होते हैं। प्रसिद्ध कथन: विषाक्त संबंध भी कोई संबंध न होने से बेहतर है।
c. स्व मनोविज्ञान की केंद्रीय अवधारणाओं में से एक: “स्व-वस्तु अनुभव/कार्य”
इसके तीन प्रमुख तत्व हैं: “प्रतिबिंबन (देखा जाना, मान्यता मिलना), आदर्शीकरण (शांत, शक्तिशाली, पूर्ण शक्ति से जुड़ाव), जुड़वाँपन/अन्य-स्व (दूसरों के साथ बुनियादी समानता, समान अस्तित्व, जुड़ाव का एहसास)”। माँ के साथ स्वस्थ जुड़ाव -> अपने भीतर स्वस्थ आत्म-सांत्वना (स्व-वस्तु) की क्षमता का विकास।
अस्वस्थ परिस्थितियों में निम्न गुणवत्ता वाले संबंध विकसित होते हैं: a. निम्न गुणवत्ता वाला प्रतिबिंबन: दूसरों की प्रशंसा की तीव्र लालसा; b. निम्न गुणवत्ता वाला आदर्शीकरण: कुछ लोगों की अंधभक्ति और उनका आदर्शीकरण, या उनके पर्याप्त आदर्श न होने का पता चलते ही (जैसे प्रेमी या प्रेमिका के मामले में) तुरंत बिखर जाना; c. निम्न गुणवत्ता वाला अन्य-स्व: जुड़वाँ शिशुओं जैसा अभेद चाहना, असीम छूट देना, दूसरों की सीमाओं का सम्मान न करना।
तीन, अस्वस्थ ढाँचों की पुनरावृत्ति
अस्वस्थ संबंध -> संबंधों के अस्वस्थ ढाँचे -> व्यक्तित्व के अस्वस्थ ढाँचे। मन और अंतर्मन का अध्ययन जिन कर्मगत अवरोधों पर काम करता है, उनकी यह एक कुंजी है। पिछले लेखों 《निम्न-मध्यवर्गीय मनोव्यथा》, 《छोटे कस्बे के परीक्षा-साधक की व्यथा》 और 《विश्वविद्यालय के छात्रों का बुनियादी अंतर्विरोध》 में अभिजनवाद, श्रेष्ठता-बोध, एकाकीपन, स्वतंत्रता से पलायन जैसे अस्तित्वगत संकटों की मनोवैज्ञानिक जड़ें देखी जा सकती हैं।
मनुष्य के पाँच तत्वों—पढ़ाई, करियर, सामाजिक मेलजोल, शरीर और मन—को व्यवस्थित करके देखने पर दो प्रकार के ढाँचे दिखाई देते हैं: 《जुड़ाव बनाम उलझाव》।
चार, निज-स्वभाव का जुड़ाव बनाम कर्मगत अवरोधों का उलझाव
कर्मगत उलझाव में कर्मगत अवरोध परस्पर क्रिया करते हैं, प्रक्षेपण करते हैं, माँगते हैं और आसक्ति के साथ ज़ोर लगाते हैं; यह निज-स्वभाव के प्रकाश से उपजा सहज जुड़ाव नहीं है।
इसलिए संबंधों में होता है: खोखलापन, बेचैनी, कर्मगत अवरोधों की धुंध, जुड़ाव टूटने का एहसास; एक बिस्तर पर सोकर अलग-अलग सपने देखना, अपने ही लोगों से लड़ना; मानसिक शक्ति का क्षय और मन-बुद्धि का पतन,
इनके बजाय: सादगी, स्थिरता, प्रकाश, जुड़ाव का एहसास; समान आदर्श और समान मार्ग, एक नाव में मिलकर संकट पार करना; मानसिक शक्ति का पोषण और मन-बुद्धि की निर्मलता।
किसी व्यक्ति की मनोस्वास्थ्य-बहाली, दिशा और डायरी में भी यह देखा जाता है कि जीवन के पाँच तत्वों (पढ़ाई, करियर, सामाजिक मेलजोल, शरीर और मन) के साथ उसकी स्थिति क्या है—जुड़ाव या उलझाव। जब जुड़ाव की अवस्था नहीं है (निज-स्वभाव का प्रकाश सहज ही जुड़ता है), तो देखना होगा कि जुड़ाव कैसे टूटा और किन चीज़ों के साथ उलझाव है।
बच्चे सुंदर क्यों लगते हैं: बच्चों में कर्मगत अवरोध कम, प्रकाश अधिक और सहज पूर्णता होती है। उनके साथ हमारे कर्मगत अवरोध कम उकसते हैं और सुंदर जुड़ाव अधिक बनता है। बच्चों की भूमिका उलट दी जाती है: बड़ों को उनकी देखभाल करनी चाहिए, लेकिन अक्सर बच्चे एक ऐसे पात्र बन जाते हैं जो बड़ों के बिखराव और कर्मगत प्रक्षेपण को समेटता है।
《सामाजिक संबंधों का चयन》: किसी संबंध को परखना—जुड़ाव बनाम उलझाव।
《टहलने पर》: टहलते समय साफ़ दिखाई देता है कि मनुष्य सहज रूप से जुड़ भी रहा है और अनेक कर्मगत अवरोधों में उलझ भी रहा है।
पाँच, निम्न गुणवत्ता वाले संबंध और उलझाव
लोग बचपन से ही (मूल परिवार, शुरुआती शैक्षिक परिवेश, शुरुआती कार्यस्थल के परिवेश, मूल सामाजिक परिवेश में) निम्न गुणवत्ता वाले संबंधों और उलझावों के अभ्यस्त हो जाते हैं, निम्न गुणवत्ता वाले ढाँचों के अभ्यस्त हो जाते हैं। यही कारण है कि वे अच्छे चक्र की ओर नहीं बढ़ पाते। लेकिन आबादी का बहुमत बनने वाले निचले तबकों के लोग लगातार प्रतिकूल परिवेश से गुज़रने के बावजूद सादगी, सत्य, भलाई और सुंदरता बनाए रखते हैं। यह मानव-स्वभाव के प्रकाश की सहज पूर्णता का अकाट्य प्रमाण है।
पिछला लेख 《जुड़ाव कैसे टूटता है》 विश्लेषण करता है कि हर व्यक्ति में सहज पूर्णता होने के बावजूद वह कर्मगत अवरोधों और टूटे जुड़ाव की ओर क्यों बढ़ता है।
- स्वयं के साथ:
अपने अतीत से जुड़ाव टूटना और उलझना: पछतावा, कल्पनाएँ।
शरीर से जुड़ाव टूटना और उलझना: जैसे 《छोटे कस्बे के परीक्षा-साधक की व्यथा》 में, शरीर को यातना देना, जागकर पढ़ने के लिए जाँघ में सुआ चुभोना।
अंतर्मन से जुड़ाव टूटना और उलझना: अंतर्मन को यातना देना, अनुभूतियों और अंतर्मन से जुड़ाव टूट जाना। यह भी वह स्तर है जिस पर अंतर्मन से जुड़ी विभिन्न विद्याएँ काम करती हैं।
- पढ़ाई और करियर के साथ उलझाव
लोग अक्सर अपने प्रिय काम की तलाश नहीं करते, बल्कि खोखली प्रतिष्ठा, दिखावे और तात्कालिक लाभ के पीछे भागते हैं, और कहते हैं कि यह परिवार के लिए है। पढ़ाई और करियर से उनका वास्तविक जुड़ाव नहीं होता।
पढ़ने से भी जुड़ाव नहीं होता; वह केवल सजावट बन जाता है—छह शास्त्रीय ग्रंथों को अपने विचारों की पुष्टि में लगाना, ज्ञान का ढेर जमा करना, आध्यात्मिक साधना की व्याधि और अभिजनवाद।
- दूसरों के साथ उलझाव
निम्न गुणवत्ता वाले, विषाक्त संबंध; खाने-पीने के साथी; अल्पकालिक साथी चुनने वाले संबंध।
कई परिवार हर दिन साथ रहते हैं, लेकिन उनमें उलझाव अधिक और जुड़ाव कम होता है।
छोटे नौकरशाह अक्सर जेल के दबंग कैदी जैसे बन जाते हैं। ऊपर वालों को रिझाना अनिवार्य रूप से नीचे वालों पर अत्याचार में बदलता है: यानी यातना सहने के साथ-साथ यातना देने का अधिकार भी रखना, दोनों ओर कर्मगत उलझाव। बहुत-से लोग बाहर अपमान सहते हैं और घर में अपनी खीझ बच्चों पर उतारते हुए उन्हें दबाते हैं; घर में ही धौंस जमाने के पीछे भी यही सिद्धांत काम करता है।
《निम्न-मध्यवर्गीय मनोव्यथा》, 《विश्वविद्यालय के छात्रों का बुनियादी अंतर्विरोध》, 《छोटे कस्बे के परीक्षा-साधक की व्यथा》: हमउम्र लोगों की आपसी प्रतिस्पर्धा की अंतहीन दौड़ से पैदा होने वाला उलझाव। हमउम्र लोग, सहपाठी और सहकर्मी एक ही राह के साथी होने चाहिए थे—एक जैसी परिस्थितियों में “शॉशैंक मुक्ति” पाने वाले, नोरा की तरह घर छोड़कर निकलने वाले। लेकिन वे अक्सर अंतहीन प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन-श्रेष्ठता और आपसी तुलना के औज़ार बन जाते हैं; जुड़ाव टूटता है, उलझाव बढ़ता है और अस्तित्वगत शून्यता गहरी होती है।
《दूसरों के कर्मगत अवरोध हमारे कर्मगत अवरोधों के ज़रिए असर करते हैं: समान पीढ़ी और समान पद वाले सहकर्मियों के कर्मगत उलझाव का उदाहरण》: हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति का शत्रु है। हमउम्र लोगों के संबंध अंतहीन प्रतिस्पर्धा से मुक्त हों, इसके लिए साम्यवाद आने तक प्रतीक्षा करनी होगी। उससे पहले, यह सब परीक्षा-साधकों, विश्वविद्यालय के छात्रों और निम्न-मध्यवर्ग के अस्तित्वगत संकट की जड़ों में से एक बना रहेगा।
- समाज के साथ उलझाव
महान अन्य के साथ उलझाव, स्वतंत्रता से पलायन, प्रक्षेपण और पूर्वाग्रह आदि।
जनता/समाज/इतिहास/दुनिया के साथ जुड़ाव के बजाय उलझाव, जैसे क्षेत्रीय भेदभाव, निचले तबकों के साथ भेदभाव और उन्हें नीचा दिखाना।
- प्रकृति के साथ उलझाव
प्रकृति से जुड़ने के बजाय उसे “जीतना”, उसे ठुकराना।
छह, मनोविज्ञान का अधिक गहरा स्तर, जुड़ाव और संबंधों का केंद्रीय कार्य: समेटना और सांत्वना देना
शिशु और माँ एकात्मकता से अलग-अलग अस्तित्व बनने की ओर बढ़ते हैं। जब शिशु नियंत्रण न होने की कुंठा और पीड़ा (भूख, पेशाब से भीगना) से जूझता है, तो उसके स्व की समेटने और सांत्वना देने की क्षमता अपर्याप्त होती है, और वह बाहर से (माँ के साथ जुड़ाव के माध्यम से) सांत्वना देने वाला कार्य प्राप्त करता है।
स्व की समेटने और सांत्वना देने की क्षमता पर्याप्त न होना, स्व का पर्याप्त सुदृढ़ और परिपक्व न होना, विभिन्न विकृत अवस्थाएँ (स्व मनोविज्ञान में ऊर्ध्वाधर/क्षैतिज विभाजन, वस्तु-संबंध संप्रदाय में अवसाद–विभाजन)। दूसरों के प्रक्षेपण को समेटने की क्षमता भी नहीं होती (बियोन का α कार्य)।
एक अन्य लेख 《मनोविज्ञान का सबसे आधारभूत मॉडल》 में चर्चा है: अनुभूति-समुच्चय, सजगता–समेटने का समुच्चय (a. भावनाओं को समेटने की क्षमता, b. रक्षा-प्रक्रियाओं का समुच्चय, c. कर्मगत अवरोधों की व्यवस्था, d. सहज पूर्णता, उच्चतर अनुभूतियाँ, अनुभूतियों के बारे में अनुभूतियाँ), ऊर्जा-समुच्चय, काम-ऊर्जा का समुच्चय।
सजगता सबसे महत्वपूर्ण बात है
हर दिन की सबसे महत्वपूर्ण बातों—आराम करना, भोजन करना, व्यायाम और शारीरिक गतिविधि, रक्त-शर्करा का नियंत्रण, गहराई से सोचना, कर्मगत अवरोधों के उलझाव को रोकना और निज-स्वभाव का जुड़ाव बहाल करना—के लिए ऊँची सजगता चाहिए, जद्दोजहद नहीं। 《मंच सूत्र》: “पिछले क्षण का विचार मोहग्रस्त हो तो साधारण मनुष्य; अगले क्षण का विचार बोध पाए तो बुद्ध।”
हर दिन की वे जद्दोजहद और ज़ोर लगाने वाली गतिविधियाँ अक्सर परिस्थितियों से संचालित होती हैं, या स्वयं अपने लिए परेशानी पैदा करने वाली होती हैं। सजगता उनमें मौजूद कर्मगत अवरोधों की अवस्था को हल्का कर सकती है।
लेकिन सजगता मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होती, इसलिए डायरी बहुत महत्वपूर्ण है: ऊँची सजगता की अवस्था का कम सजगता की अवस्था से जुड़ाव।
जुड़ाव और तथ्यों से सत्य की खोज
तथ्यों से सत्य की खोज करना वर्तमान क्षण, स्वयं और दूसरों के साथ अच्छे जुड़ाव का परिचायक है।
स्वयं के साथ अच्छा जुड़ाव न हो तो वियोजन और दिशाहीनता होती है।
दूसरों के साथ अच्छा जुड़ाव न हो तो कल्पनाएँ, लोभ, द्वेष और मोह होते हैं, और वर्तमान में बने संबंध की सीमाएँ लाँघी जाती हैं।
वर्तमान क्षण के साथ अच्छा जुड़ाव न हो तो प्रतिरोध और अधीर बेचैनी होती है।
सात, भौतिकवाद और वर्ग
निम्न-मध्यवर्ग के तथाकथित बोधप्राप्त लोगों और पहले ही शांत हो चुके लोगों का यह सौभाग्य है। लेकिन अधिकांश के लिए निम्न-मध्यवर्गीय कर्मगत अवरोधों को जड़ से मिटाना भी कठिन होता है।
सर्वहारा में कर्मगत अवरोध कम होते हैं, वे सादगी बनाए रखते हैं, और अनगिनत लोग सहज ही बोध की ओर बढ़ते हैं। यह सहज पूर्णता और निज-स्वभाव के प्रकाश की शक्ति को दर्शाता है।
पिछला लेख 《मनोवैज्ञानिक विकास के नए स्तरों और आवश्यकताओं का मॉडल》: आधारभूत स्तर, अस्तित्ववादी स्तर, बोध का स्तर, आत्म-साक्षात्कार का स्तर।