दृढ़ता से अपने जैसे रहें, खुद की पीठ में छुरा न घोंपें
एक、केवल स्वयं को पता है
केवल स्वयं को पता है कि हम कितनी दूर चले आए हैं।
केवल स्वयं को पता है कि हमने कितनी कठिन लड़ाइयाँ लड़ी हैं।
केवल स्वयं को पता है कि हम कितने गहरे और सड़े हुए कीचड़ से रास्ता बनाकर निकले हैं।
केवल स्वयं को पता है कि कब हमारा निज-स्वभाव अपनी पूरी आभा में चमका है।
केवल स्वयं को पता है कि दूसरों की नज़रों में साधारण लगने वाले समय में हम कितनी दिल दहला देने वाली घटनाओं, पीड़ा और संघर्ष से गुज़रे हैं।
केवल स्वयं को पता है कि हमारे अँधेरे पक्ष किन आघातों और पीड़ाओं से उपजे हैं, और हमने उनका क्या उदात्तीकरण किया है, उनसे मुक्ति पाने के लिए क्या किया है।
केवल स्वयं को पता है कि हम कब-कब चुपचाप फूट-फूटकर रोए हैं।
केवल स्वयं को पता है कि लोगों, घटनाओं और दुनिया के प्रति हमारी निष्ठा कितनी निष्कपट है।
केवल स्वयं ही उन गहरे जुड़ावों के क्षणों में उभरी समझ और आत्मीयता की मुस्कान के साक्षी हैं।
केवल स्वयं को अपने साहस और आत्मविश्वास का पता है।
केवल स्वयं को पता है कि हम कितने ज़बरदस्त हैं।
अतीत में हम आज से बहुत कमज़ोर थे, हमारे पास बहुत-सा ज्ञान और बहुत-से संसाधन नहीं थे। फिर भी हमारा सामना ऐसे पीड़ादायक, भयावह अनुभवों से था, जिन्हें सँभालना आज भी हमारे लिए कठिन है, और जिनसे अतीत के हमारे ही रूप ने हमें बचाया था।
दो、स्वयं ही एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी, न्यायाधीश और मुक्तिदाता है
हम स्वयं अपने एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी हैं। और स्वयं ही वह एकमात्र न्यायाधीश हैं जो हमारे अन्यायपूर्ण कलंक को मिटा सकता है, सच्चाई उजागर कर सकता है और हमें अविराम यातना के नरक से मुक्त कर सकता है।
संसार की, महा-अन्य की परख यांत्रिक होती है। दूसरों की परख यथार्थ के अनुरूप हो ही नहीं सकती। केवल अपनी परख में ही यथार्थ के अनुरूप होने की सैद्धांतिक संभावना है, केवल उसी से मार्ग खुल सकता है। जीवन के अनगिनत अनसुलझे और संदिग्ध मामलों को केवल हम स्वयं सुलझा सकते हैं; यदि संदेह भर के आधार पर बेरहमी से कठोर दंड देते रहें, तो हमें निराधार दोष का बोझ उठाकर पूरी ज़िंदगी कष्ट में काटनी होगी।
केवल हम स्वयं को शॉशैंक की जेल से रिहा कर सकते हैं। मन का बोझ उतरना, मुक्त होना। जिस दिन मन का बोझ उतर जाता है, पिंजरा विलीन हो जाता है। आकाश असीम है, पक्षी जहाँ चाहे उड़ सकता है।
मैं न कोई प्रत्यक्षदर्शी हूँ, न कोई न्यायाधीश। किस अधिकार से मेरा न्याय किया जाए?
मैं तो अपने आप में स्वतंत्र, बिना किसी शर्त के विद्यमान हूँ। ब्रह्मांड का कभी मनुष्य के लिए पिंजरा बनाने का इरादा नहीं था। आकाश और पृथ्वी किसी पर विशेष कृपा नहीं करते; उनके लिए समस्त वस्तुएँ अनुष्ठान में प्रयुक्त घास के कुत्तों जैसी हैं। पिंजरा निजी स्वामित्व और अलगाव वाला यह ऐतिहासिक विकास-चरण है।
तीन、केवल दृढ़ता से स्वयं बने रहना
मनुष्य ब्रह्मांड के परमाणु हैं, संयोगों से जीवन बनता है। मनुष्य को एक ही जीवन मिलता है, और उस पूरे जीवन में करने को केवल एक काम है—स्वयं होना; स्वयं होने में करने को केवल एक काम है—वर्तमान में जीना।
केवल दृढ़ता से स्वयं बने रहकर ही हम अपने सच्चे स्वरूप को जी सकते हैं और संकुचित अहं से मुक्त हो सकते हैं।
केवल दृढ़ता से स्वयं बने रहने पर ही विश्वास साकार हो सकता है और मन के बदलने से परिस्थितियाँ बदल सकती हैं।
केवल दृढ़ता से स्वयं बने रहकर ही हम यथार्थ के अनुरूप हो सकते हैं, आग्रह-रहित मन पा सकते हैं, ताओ के अनुरूप हो सकते हैं और वर्तमान में जी सकते हैं; यही वर्तमान दूसरा तट है।
केवल दृढ़ता से स्वयं बने रहकर ही हम अपनी जन्मजात प्रतिभा और अपनी नियति को जान सकते हैं। जन्मजात प्रतिभा ही नियति है, नियति ही जन्मजात प्रतिभा है।
केवल दृढ़ता से स्वयं बने रहने पर ही मन हमारे काम आ सकता है। मन और चेतना की एकता, मनुष्य और प्रकृति की एकता। ध्यान में स्वयं को भुला देना, मन को रिक्त और निर्मल करना, प्रवाह में डूबना, मन का अनुसरण करना, उन्मुक्त विचरण करना। स्वतंत्र और सहज होना।
केवल आत्मविश्वास और आत्मप्रेम से ही हम दूसरों पर विश्वास करने और उनसे प्रेम करने में सक्षम होते हैं, तभी दूसरे भी हम पर विश्वास और हमसे प्रेम कर सकते हैं। केवल अपने प्रति करुणामय, स्पष्टदर्शी और सहज होकर ही हम दूसरों के प्रति करुणामय, स्पष्टदर्शी और सहज हो सकते हैं।
केवल अपने प्रति निष्ठावान और निष्कपट व्यक्ति ही दूसरों के प्रति निष्ठावान और निष्कपट हो सकता है।
चार、अपनी ही पीठ में छुरा न घोंपना
यदि हम स्वयं पर गर्व नहीं करते, अपने विश्वासों पर दृढ़ भरोसा नहीं रखते और दृढ़ता से अपना जीवन नहीं जीते, तो यह स्वयं से विश्वासघात करना है, स्वयं से अपना जुड़ाव तोड़ देना है।
हमने अनगिनत बार अपनी ही पीठ में छुरा घोंपा है, अपने पक्ष में गवाही नहीं दी, बल्कि दूसरों के नीचा दिखाने, बदनाम करने और घेरकर हमला करने में उनका साथ दिया है; और हमने अपनी ही पीठ में छुरा घोंपने वाले अपने उस रूप को अनगिनत बार क्षमा भी किया है।
स्वयं होने और यथार्थ के अनुरूप रहने के लिए साहस चाहिए। जब तक हम साहस विकसित करके डगमगाहट और कायरता से बाहर नहीं निकलते, हमारा निज-स्वभाव हमारी प्रतीक्षा करता रहता है। मनुष्य के सबसे बदहाल, सबसे अधिक टूटे हुए क्षणों में, अपनी ही पीठ में छुरा घोंपना भी स्वयं को सँभालने का उसका एक तरीका होता है। इसलिए हमारे निज-स्वभाव का प्रकाश कभी नहीं टूटा। टूटन और व्यथा से लौटकर फिर शांति पाना, अग्नि से गुज़रकर आत्मिक पुनर्जन्म पाना, मनुष्य का वह निज-स्वभाव है जो शैशव से ही प्रकट होता है। हमारा निज-स्वभाव हमेशा खाई के नीचे हमें थामने के लिए मौजूद रहता है।
निज-स्वभाव जानता है कि अपनी ही पीठ में छुरा घोंपने वाला वह व्यक्ति बस टूट चुका है, बस अनगढ़ और अज्ञानपूर्ण ढंग से खुद को टूटने से बचा रहा है।
किसने सोचा था कि निज-स्वभाव में सहज पूर्णता है; किसने सोचा था कि निज-स्वभाव न मलिन है, न निर्मल, न बढ़ता है, न घटता है।
मैं अपने निज-स्वभाव का गुणगान करना चाहता हूँ, पर निज-स्वभाव को मेरे गुणगान की आवश्यकता नहीं है। मैं निज-स्वभाव का वर्णन करना चाहता हूँ, और निज-स्वभाव मुझे कोमलता से देखता रहता है। जिस ताओ को शब्दों में कहा जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है। ताओ सहज प्रकृति का अनुसरण करता है।
अपनी ही पीठ में छुरा घोंपने वाले अपने रूप को स्वीकारना और पोषित करना, स्वयं के प्रति हमारी निष्ठा और निष्कपटता है। इसलिए हमें स्वयं के प्रति निष्ठावान और निष्कपट होना चाहिए।