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पिनदुओदुओ के टिप्पणी खंड का साहित्य और सब्ज़ी बाज़ार से मिलने वाली चंगाई

पिनदुओदुओ के टिप्पणी खंड का साहित्य और सब्ज़ी बाज़ार से मिलने वाली राहत

एक、PDD के टिप्पणी खंड का साहित्य

शिआओहोंगशू पर स्क्रॉल करते हुए मैंने बहुत से लोगों को “पिनदुओदुओ साहित्य” पर चर्चा करते देखा, यानी PDD के टिप्पणी खंड में लिखी वे बातें जो दिल को छू जाती हैं।

ये बातें अक्सर समाज के निचले तबकों और गाँवों के आम लोगों की लिखी होती हैं—बेहद सादी, खुशी से भरी तारीफ़ें या हल्की-फुल्की शिकायतें। साथ लगी तस्वीरों में अक्सर बहुत देहाती, ग़रीब और जर्जर परिवेश होता है, जिसके बीच PDD के सस्ते मगर आधुनिक दिखने वाले उत्पाद रखे होते हैं। इंटरनेट पर माहिर छोटे-मोटे निम्न-मध्यवर्गीय लोगों की तरह उन्हें अपनी बात कहने के मौके कम ही मिलते हैं, इसलिए टिप्पणी लिखने को वे एक गंभीर काम मानते हैं। लिखित शब्दों से उनके गिने-चुने जुड़ावों में यह भी एक है, इसलिए इसे सचमुच साहित्य कहा जा सकता है। अनायास झलक पड़ने वाले दुःख और जीवन-दर्शन दिल को और भी अधिक कचोटते और झकझोरते हैं।

पहले एक बार वीडियो देखते हुए मैंने गाँव के एक दादाजी को हाट में अपनी पोती के लिए सिंथेटिक कपड़े की घेरदार, फूली हुई फ़्रॉक खरीदते देखा था। पोती खुशी से उछल-कूद रही थी, उसका चेहरा खिल उठा था। उस समय मैं बहुत भावुक हो गया था। उससे मुझे यह समझ मिली कि सबसे सस्ती औद्योगिक वस्तु भी किसी को भरपूर खुशी दे सकती है। सस्ते सुपरमार्केटों और हाट-बाज़ारों में खुले बिकने वाले जंक फ़ूड और घटिया मिठाइयों से, सेहत का ख़याल रखने वाले एक निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति के नाते, मुझे स्वाभाविक रूप से बेहद परहेज़ था—अस्वास्थ्यकर चीनी, तेल और तरह-तरह की तकनीकी तरकीबों व मिलावटों से बने ये मिश्रण अनजान लोगों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। बाद में कभी-कभी ख़याल आता था कि इन्हीं चीज़ों ने कितने लोगों को सुख और खुशी दी होगी।

कभी-कभी PDD के टिप्पणी खंड में असली उत्पाद की तस्वीरें देखने जाता हूँ, लेकिन वहाँ लोगों को अपनी ग़रीबी भरी ज़िंदगी किसी तरह सँभालने की पूरी कोशिश करते देखता हूँ। उसमें वैन गॉग की पेंटिंग ‘आलू खाने वाले’ और कैथे कोलविट्स के छापाचित्रों जैसा सौंदर्य महसूस होता है। वैन गॉग जैसे बहुत से चित्रकार अक्सर झुकी कमर वाले, ढीले-ढाले और बेडौल कपड़े पहने लोगों को चित्रित करते थे। बाद में धीरे-धीरे समझ आया कि हमारे जीवन में समाज के निचले तबके के लोग ऐसे ही तो होते हैं; वे भोली-सी हँसी भी हँसते हैं, डरते और सकुचाते भी हैं। लेकिन उन्हें देखकर एक ताक़त भी दिखाई देती है—जंगली घास के उगने की ताक़त।

दो、सब्ज़ी बाज़ार से मिलने वाली राहत

मैं खुद ऐसा करता हूँ और दोस्तों से भी इस बारे में बात कर चुका हूँ कि सब्ज़ी बाज़ार मन को सींचता है। पहले मैंने ‘छोटे-मोटे निम्न-मध्यवर्गीय लोगों से घिरे होने का सिंड्रोम’ नाम से लिखा था कि “आम लोग”, यानी विमर्श पर पकड़ रखने वाले छोटे-मोटे निम्न-मध्यवर्गीय लोग, “आधुनिक समाज के लोग”, अक्सर सर्वहारा वर्ग से बहुत दूर होते हैं, किसानों से बहुत दूर होते हैं। सर्वहारा वर्ग और किसान उनके लिए अपरिचित होते हैं, उनकी कल्पनाओं में गढ़े हुए होते हैं, यहाँ तक कि उनके प्रति शत्रुता भी होती है।

सब्ज़ी बाज़ार हमें सादे और जीवंत मेहनतकश लोगों के क़रीब लाता है, सादी खाद्य सामग्री और प्रकृति के क़रीब लाता है—अच्छा, इंसान इस तरह भी जी सकता है। निम्न-मध्यवर्गीय मनोव्यथा में इससे बहुत राहत मिलती है। जीने के और तरीक़े देखना अपने आप में, दुनिया को देखना, तमाम जीवों को देखना और खुद को देखना, हमारा नज़रिया व्यापक बनाता है। शिआओहोंगशू पर कामकाजी लोगों के समुदाय वाले हिस्से का यह भी एक सकारात्मक अर्थ है। वस्तुतः शिआओहोंगशू ने आम लोगों के लिए “दूसरों की नज़र में आने” की बाधाएँ कम की हैं। क्वाइशोउ और डोउयिन ने भी अनगिनत आम लोगों को वीडियो पोस्ट करने का माध्यम दिया है, लेकिन वहाँ की बाधाएँ अब भी अपेक्षाकृत ऊँची हैं।

अब जब भी कहीं घूमने जाता हूँ, वहाँ का स्थानीय सब्ज़ी बाज़ार मेरे घूमने की प्रमुख जगहों में शामिल होता है। युन्नान के सब्ज़ी बाज़ारों का ऊर्जा-क्षेत्र बहुत प्रबल है। मेरी सलाह है कि आप भी इसका अनुभव करें।

तीन、निम्न-मध्यवर्गीय नज़र

चाहे PDD साहित्य हो या सब्ज़ी बाज़ार से मिलने वाली राहत, इनके पीछे अक्सर एक निम्न-मध्यवर्गीय नज़र भी होती है, ऊपर से नीचे देखने वाला नज़रिया। जिसे राहत कहा जाता है, वह कभी-कभी श्रेष्ठता का एहसास, अनोखेपन का तमाशा देखने की उत्सुकता, अपनी स्थिति पर शुक्र मनाना और अपने ही भावों से अभिभूत होना होता है। इसमें अब भी वर्गीय पहचान से उपजा बहुत-सा भेदभाव और क्षुद्र अहं मौजूद रहता है।

युन्नान के एक काउंटी कस्बे में एक साल से ज़्यादा समय तक भागदौड़ छोड़कर जीने के बाद, सब्ज़ी बाज़ार और बड़े हाटों में जाने को लेकर मेरी भावनाएँ अधिक जटिल हो गई हैं। आख़िर वहाँ दुःख का भारी बोझ है; बहुत-से सरलीकृत वर्णन और प्रशंसाएँ बेहद हल्की पड़ती हैं।

विश्व-दृष्टि, जीवन-दृष्टि और मूल्य-दृष्टि को नए सिरे से गढ़ना एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है, और यह एक बहुत अर्थपूर्ण, साहित्यिक गुणों से भरी प्रक्रिया भी है।