व्यक्ति की ऊर्जा और सजगता के वक्र
एक、मन और चेतना का एकीकरण
ऊर्जा: शरीर और मन; सजगता का स्तर: चेतना।
इनके बीच काम का बँटवारा और तालमेल कुछ ऐसा है: चालक बनाम सहचालक; ड्राइवर बनाम मालिक।
दो、उतार-चढ़ाव के नियम
ऊर्जा और सजगता के उतार-चढ़ाव पानी की तरह हैं। उनके बढ़ने-घटने के अपने नियम हैं, लेकिन उनका पूरी तरह पूर्वानुमान भी नहीं लगाया जा सकता।
ऊर्जा के शिखरों का संतुलन: ऊर्जा कम होने पर याद रखें कि ऊँची ऊर्जा के समय अपने मूल स्वरूप की शांति से उपजा आत्मविश्वास था। ऊर्जा बरबाद करने वाले बहुत-से व्यवहारों को पहचानें; निष्फल कोशिशें करना, सबको सुकून पहुँचाने वाला केंद्रीय एयर कंडीशनर बनना और दूसरों को बचाना छोड़ दें। ऊर्जा मध्यम हो, लेकिन बेलगाम अहंकार और लोभ, द्वेष व मोह से भरी कल्पनाओं में बहने से खुद को रोक न पाएँ, तो कम ऊर्जा वाले समय को याद करें।
कभी ऊर्जा मध्यम होती है और सजगता कम; कभी ऊर्जा कम होती है और सजगता अधिक। कभी ऊर्जा और सजगता दोनों अधिक होती हैं, तो कभी दोनों कम।
तीन、ऊर्जा और सजगता का एक-दूसरे पर प्रभाव
लंबे समय तक ऊर्जा अधिक रहना, लंबे समय तक ऊर्जा कम रहना, और ऊँची व नीची ऊर्जा के बीच तेजी से बदलाव जैसी स्थितियाँ सजगता बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं।
हर दिन अपनी ऊर्जा और सजगता के स्तर को दर्ज करने पर विचार किया जा सकता है।
लंबे समय तक ऊर्जा खर्च करते रहने, भीतर ही भीतर खपते रहने और व्यस्त रहने से अनजाने में बहुत-सा तनाव, दबाव और कॉर्टिसोल जमा हो जाता है, और सकारात्मक संचित संसाधन बहुत घट जाते हैं। हमेशा बिना सोचे-समझे काम में जुटे रहना, कुछ न कुछ करते रहना। तब तक, जब तक पूरी तरह थक न जाएँ, जब तक टूट न जाएँ।
लंबे समय तक मिलने वाला सकारात्मक पोषण, सेरोटोनिन, एंडॉर्फिन, ऑक्सीटोसिन, डोपामिन आदि सुख और आनंद का जैवरासायनिक आधार हैं।
पिछले कुछ वर्षों का एक ढर्रा:
कम ऊर्जा के बीच सजगता आती है, कभी-कभार कोई突破 मिलती है या कोई रचना बनती है, उस पर प्रतिक्रिया मिलती है, और फिर ऊर्जा मध्यम स्तर पर पहुँच जाती है।
लेकिन ऊर्जा बढ़ने के बाद लोभ, द्वेष, मोह, कल्पनाएँ और आसक्तियाँ फिर उभर आती हैं; व्यर्थ की भागदौड़ और अपना ही शोषण करना फिर शुरू हो जाता है, और उसके बाद सजगता व ऊर्जा फिर कम हो जाती हैं। इस उतार-चढ़ाव वाले वक्र में कभी-कभी सजगता ऊँची होती है और मूल स्वरूप शांत होता है।
यही पिछले कुछ वर्षों का बार-बार दोहराया जाने वाला ढर्रा है।
कुछ समय तक ऊर्जा कम रहने के बाद वह सँभलकर ऊपर चढ़ने लगती है। ऊर्जा मध्यम स्तर पर आते ही अपने को बहुत बड़ा समझने लगता हूँ। लोभ, द्वेष और मोह में पड़ना चाहता हूँ, इतराना चाहता हूँ, लोगों को बचाना चाहता हूँ। आत्ममोह से जुड़े अवसाद और आत्ममोह से जुड़े अतिउत्साह के बीच उतार-चढ़ाव, आत्ममोह से जुड़ी उन्माद-अवसाद की अवस्था।