मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

कर्मजनित बाधाओं की शृंखला

सिर्फ किस्मत साथ देने और ताकत मिलने पर सामाजिक डार्विनवादी या अभिजनवादी नहीं बना जा सकता

एक、सामाजिक डार्विनवाद और अभिजनवाद

प्रोग्रामरों का समुदाय अक्सर काफ़ी दक्षिणपंथी होता है; उनकी बुनियादी विचारधारा अभिजनवाद और सामाजिक डार्विनवाद है। उनके विचार ये हैं:

  1. यह दुनिया बेहद न्यायपूर्ण है, बशर्ते तुम मेहनत करो।
  1. आज समाज इतना विकसित हो चुका है कि अगर तुम मेहनत करो, तो पैसे कमा सकते हो।
  1. बस व्यावहारिक ढंग से कदम बढ़ाओ, पेशा बदलकर प्रोग्रामर बनो, किताबें रटो और LeetCode के सवाल हल करते जाओ, लगातार इंटर्नशिप करके किसी बड़ी टेक कंपनी में घुस जाओ। आराम से साल के कई लाख युआन कमाओगे और अपने दम पर घर खरीद लोगे।
  1. मैं तो शानदोंग, शांक्सी, हेनान और हेबेई—इन चार प्रांतों में से एक के गाँव से अपनी मेहनत के बल पर निकलकर यहाँ पहुँचा हूँ। मेरे वे सहपाठी ही अधीर हैं / मेहनत नहीं करते / उनमें कुछ गड़बड़ है।
  1. मैं तो इन्हीं चार प्रांतों में से एक के गाँव से आया, अपने दम पर शून्य से शुरुआत की, और आज असाधारण रूप से सफल हूँ, मेरे पास घर भी है और गाड़ी भी।
  1. आख़िरकार बात आईक्यू और प्रतिभा की ही है। मैं अपनी प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ा: गणित में अच्छा था, प्रतियोगिताओं में ज़बरदस्त था, और कड़ी होड़ में नामी विश्वविद्यालय और बड़ी टेक कंपनी तक पहुँच गया। और मुझसे भी अधिक प्रतिभाशाली फ़लाँ व्यक्ति तो छिंगहुआ की याओ कक्षा -> MIT -> देश लौटकर अपना उद्यम -> एक अरब युआन की संपत्ति तक पहुँच गया।

यही सफलता और दबदबा हासिल कर चुके निम्न-मध्यवर्ग की ठेठ विचारधारा है।

दो、ठंड की पूरी चुभन महसूस करना

2024 की दूसरी छमाही से शुरू हुए एक साल के दौरान, लगभग सभी बड़ी टेक कंपनियों के प्रोग्रामरों ने इस ठंड की पूरी चुभन महसूस कर ली: किसी को “अनुकूलन” के नाम पर नौकरी से निकाला गया, किसी का पद बदल दिया गया, किसी को मनोवैज्ञानिक हेरफेर और दबाव का सामना करना पड़ा। बायोडाटा भेजने पर ख़ास प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो वे उन कंपनियों तक को स्वीकार करने लगे जिन्हें पहले अपने स्तर से नीचे समझते थे। बहुत-से लोग कह रहे हैं: यह नौकरी ख़त्म हुई, तो शायद अगली मिलेगी ही नहीं। बहुत कम लोगों में इतना भरोसा बचा है कि वे 40 की उम्र के बाद के करियर की योजना बना सकें। लगभग सभी अपने आसपास के किसी न किसी सहकर्मी की चर्चा करने लगे हैं कि उसने सबसे ऊँचे दाम पर बड़ा घर खरीद लिया था और अब उसकी कैसी दुर्दशा हो रही है, वगैरह-वगैरह।

तीन、अभिजनवादियों पर लौटकर आती चोट

अब प्रोग्रामरों के लिए अपने अभिजनवाद को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। क्योंकि उन्हें पता चल रहा है कि मेहनत बेअसर है, सब मानो पहले से तय है, वर्गों के बीच की सीमाएँ जम चुकी हैं, तकनीक सर्वशक्तिमान नहीं है, नौकरशाही हर तरफ़ हावी है, और उनके तथाकथित आईक्यू और प्रतिभा को आज कोई दिशा नहीं मिल रही। हालात ख़राब हों तो दोष अपनी अक्षमता, मेहनत की कमी और कम आईक्यू को दो—इस तर्क का बोझ अब वे ख़ुद नहीं उठा पा रहे हैं।

छोटे कस्बों से आने वाले नए परीक्षा-कुशल युवाओं ने उन्हीं की सलाह पर LeetCode के सवाल हल कर लिए हैं। वे अपने आपको प्रतिभाशाली भी मानते हैं और मेहनती भी, और बैटरी बदलने वाले स्टेशन पर पूरी तरह चार्ज बैटरियों की तरह उनकी जगह लेने का इंतज़ार कर रहे हैं। (पिछला लेख: कॉलेज छात्रों की भरमार से मिलने वाला लाभ और इंजीनियरों की आपसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा से मिलने वाला लाभ तो अभी शुरू ही हुआ है।) उम्मीद थी कि 2000 के बाद जन्मी यह पीढ़ी कार्यस्थल की व्यवस्था सुधारेगी, लेकिन उलटे उसी ने इन्हें बाहर कर दिया: जो मेहनत नहीं करते, वे मेरे भाई कहलाने के लायक़ नहीं हैं।

इंसान केवल अपनी क़िस्मत चमकने और दबदबा होने के दिनों में ही सामाजिक डार्विनवादी और अभिजनवादी नहीं बना रह सकता।

चार、वित्तीय क्षेत्र की स्थिति भी ऐसी ही है

वित्तीय क्षेत्र में काम करने वाले कभी ख़ुद को सबसे ऊपर समझते थे, अकड़कर चलते थे, देश-दुनिया को दिशा देने की बातें करते थे, जोशीले लेख लिखते थे और बड़े-बड़े धनाढ्य सामंतों को भी धूल समझते थे।

बस, उन्हें वास्तविकता की चोट पहले लग गई। लगभग 2015, 2017 से ही वित्तीय क्षेत्र की हालत मोटे तौर पर बेहद ख़राब हो चुकी थी। सत्ता की सख़्ती और वास्तविकता के थप्पड़ों ने वित्तीय अभिजनों को निराशावादी और व्यावहारिक बना दिया। शरद ऋतु में नदी का पानी ठंडा हो, तो बतखों को सबसे पहले पता चलता है।

चार、इन दो विशिष्ट समूहों के ज़रिए निम्न-मध्यवर्ग को देखना

इनमें निम्न-मध्यवर्ग की चेतना का अभाव दिखता है—सच्ची अंतर्दृष्टि और बुद्धिमत्ता का अभाव, सजगता का अभाव। जीत में घमंड, हार में हताशा; दाम चढ़ें तो ख़रीदने दौड़ना, गिरें तो बेचने दौड़ना; सत्ता और प्रभाव के पीछे भागना; ऊँचे पद वालों की चापलूसी करना और नीचे वालों को कुचलना।

वास्तविकता की मार खाने के बाद भी निम्न-मध्यवर्ग के लोग बहुत कम ही वामपंथ की ओर मुड़ते हैं; वे बस दक्षिणपंथ से अतिदक्षिणपंथ की ओर जाते हैं। पहले उनमें थोड़ा-बहुत उदारवाद और ऑस्ट्रियाई अर्थशास्त्र का प्रभाव होता था, वे बाज़ार और उद्यमशीलता को आदर्श मानते थे। अब हर कोई विश्वयुद्धों और औद्योगिक नीतियों का अध्ययन कर रहा है, पितृसत्तात्मक सत्ता की कृपा की उम्मीद लगाए बैठा है और विराट आख्यानों के आगे नतमस्तक है।

बेशक, छोटे और अति-छोटे पूँजी-मालिकों के पिछड़े और अज्ञानपूर्ण होने की संभावना अधिक ही होती है; यह उनका वर्गीय गुण है।