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जुड़ाव शृंखला

प्रकृति से जुड़ाव बनाना और उसे महसूस करना कठिन क्यों है

पक्षियों का चहचहाना सुनना, पेड़ों के पत्तों, वनस्पतियों और फूलों को देखना, सुंदरता महसूस करना। इतनी साधारण बात इतनी कठिन क्यों है?

पिछले लेख, ‘जुड़ाव कैसे टूटता है: सहज पूर्णता से अकेलेपन और दिशाहीनता तक’, में मैंने लिखा था कि जिन छोटे बच्चों की जीवन-ऊर्जा अभी अक्षुण्ण है, उनका अक्सर माता-पिता, पशुओं, प्रकृति और अपने आप से सहज जुड़ाव होता है, और बड़े होते जाने के दौरान अपने आप से, माता-पिता से, दूसरों से, प्रकृति से और समाज से जुड़ाव की यह अनुभूति कैसे खो जाती है।

एक इंटरनेट उपयोगकर्ता ने ‘प्रकृति से दूर जाने और उसके पास लौटने की अपनी 35 साल की यात्रा पर एक नज़र’ लिखा। उसमें छोटे कस्बों से निकले, परीक्षाओं के सवाल हल करके आगे बढ़ने वाले मेरे जैसे लोगों के एक विशिष्ट अनुभव का वर्णन है: सात साल की उम्र में गाँव छोड़कर एक अधिक साफ़-सुथरे शहर आ जाना। तब यह पता नहीं था कि उसी क्षण से अगले दस से अधिक वर्षों के लिए प्रकृति से विदा ले ली थी और किशोरावस्था तथा शुरुआती वयस्क जीवन का ऐसा दौर शुरू हो गया था जो समाजीकरण, अलगाव, उथलेपन, विपन्नता, एकआयामीपन और एक ही मूल्य-व्यवस्था से संचालित था।

इस लेख में मैं प्रकृति से जुड़ाव वाले हिस्से पर व्यवस्थित रूप से लिखूँगा।

एक, जब हम बहुत अधिक बाहर की ओर खोजते हैं, तो वर्तमान से जुड़ना कठिन हो जाता है।

स्व मज़बूत नहीं होता, सुलझाने के लिए जीवन के प्रश्न बहुत होते हैं, कर्मगत अवरोध बहुत होते हैं, और हम बाहर, दूर कहीं कुछ पाने की खोज में लगे रहते हैं। हम वर्तमान में जी नहीं पाते, वर्तमान से—वर्तमान के अपने आप से—जुड़ाव नहीं बना पाते।

दो, बिना शर्त मौजूद प्रकृति से जुड़ाव नहीं बन पाया है

  1. मामूली-सा छोटा प्राकृतिक परिवेश:

उत्तर के उन इलाकों में जहाँ वनस्पतियाँ बहुत घनी नहीं हैं, स्कूल की वर्दी पहने, छोटे बाल कटवाए, छोटे कस्बे से आए परीक्षा के सवाल हल करने में जुटे बच्चे स्कूल परिसर और उसके आसपास की धूल-मटमैली सदाबहार झाड़ियों की पट्टियों तथा सड़क किनारे हाल ही में लगाए गए पतले तनों वाले पेड़ों को देखते हैं। उनसे जुड़ाव महसूस करना कठिन होता है।

  1. सुसज्जित और महँगा छोटा प्राकृतिक परिवेश:

महानगरों में सजावट के लिए लगाए गए पौधे और लोगों की भीड़ से भरे लोकप्रिय पार्क भी जुड़ाव पैदा करना मुश्किल बना देते हैं। उलटे, वे आसानी से “क्षुद्र अहं, अहं के प्रति आसक्ति, अपने पृथक अस्तित्व की धारणा, दूसरे जीवों के पृथक अस्तित्व की धारणा” को उकसा देते हैं। फूल-पौधों वाले पार्क बहुत सुसज्जित होते हैं, पेड़ बहुत करीने से लगे होते हैं, मानवीय हस्तक्षेप के निशान बहुत गहरे होते हैं। वे बार-बार याद दिलाते रहते हैं कि ऐसे माहौल का आनंद लेने के लिए आसपास के मकानों की कीमतें और किराए कितने हैं।

एक इंटरनेट उपयोगकर्ता ने लिखा, ‘हांगझोउ की पश्चिमी झील और बीजिंग का ओलंपिक फ़ॉरेस्ट पार्क मुझे किसी छोटे ज़िले के कस्बे के पार्क जितना सुकून क्यों नहीं देते’: पश्चिमी झील के किनारे मैं हमेशा सोचता हूँ कि पश्चिमी झील कितनी सुंदर है, कितनी ख़ास है, सचमुच अपने नाम के अनुरूप है। और गाँव के एक छोटे कस्बे से निकले, परीक्षा के सवाल हल करके आगे बढ़ने वाले मुझ जैसे व्यक्ति ने आख़िर कौन-कौन-सी शर्तें पूरी कीं, तब जाकर यहाँ तक पहुँच सका।

  1. युन्नान के एक छोटे ज़िले के कस्बे में मैंने मनमर्ज़ी से बढ़ती वनस्पतियाँ, सहज पूर्णता वाले आम लोग, बिना शर्त अस्तित्व और जुड़ाव की सुंदरता देखी

कई जगहों से गुज़रते हुए आख़िरकार मैं युन्नान पहुँचा। उस छोटे ज़िले के कस्बे के पार्क में मेरे मन में यह नहीं आता कि कौन-सी “शर्तें” पूरी करनी होंगी। पार्क में साधारण कपड़े पहने आम लोग भी मुझे बताते हैं कि यहाँ सब कुछ बिना किसी शर्त के सामंजस्य में है। मैं प्रकृति को देखता हूँ, पेड़ों, पत्तों, पक्षियों, मछलियों, फूलों, सूखी डालियों, गिरे हुए पत्तों और बादलों को देखता हूँ। मैं बारीकियों में डूब जाता हूँ, समग्रता में डूब जाता हूँ। अपने पृथक अस्तित्व की धारणा नहीं रहती, “पार्क” को एक अलग सत्ता मानने की धारणा नहीं रहती।

  1. गाँव के बच्चे और प्रकृति

गाँव के बच्चों की एक बड़ी ताक़त प्रकृति से उनका जुड़ाव है। बच्चा बहुत छोटा होता है, प्रकृति बहुत बड़ी। बच्चे प्रकृति के बीच बढ़ते हुए बहुत समय बिताते हैं और जानते हैं कि एक पेड़ अपने आप में एक संसार है, जिसमें अनगिनत चींटियाँ, छोटे कीड़े, पक्षी, घास और काई रहते हैं।

पहले गाँवों में रोशनी कम होती थी, इसलिए तारों भरे आकाश और ब्रह्मांड से जुड़ाव भी गहरा था।

छोटे कस्बों से निकले, परीक्षा के सवाल हल करके आगे बढ़ने वाले बहुत-से लोग अपने मूल परिवार या परिवेश से मिले आघातों और गलाकाट प्रतिस्पर्धा की व्यथा के कारण गाँवों और किसानों से अपना जुड़ाव तोड़ लेते हैं, गाँवों से घृणा करते हैं और उन्हें ठुकराते हैं। यह बड़े अफ़सोस की बात है। अपने मूल स्रोत को खोने के साथ-साथ वे कई बड़े जुड़ाव भी खो देते हैं—दूसरों से, जनसाधारण से, समाज से, इतिहास से, प्रकृति से और ब्रह्मांड से जुड़ाव।

तीन, साधना की व्यथा और अभिजनवाद: फूल-पौधों तथा प्रकृति को निहारते समय श्रेष्ठता-बोध और अकेलापन उभरना

बहुत-से लोग प्रकृति से जुड़ते समय, वसंत के फूलों, बर्फ़ और चाँद में सुंदरता महसूस करते हुए, मनुष्य और प्रकृति की एकता का अनुभव नहीं करते। उलटे, उसी समय अहंकार और अकेलापन उभर आता है। वे सोचते हैं कि केवल वे ही, या उनके जैसे गिने-चुने लोग ही, इस शांति और सुंदरता को सराह सकते हैं—अपनी कलात्मक क्षमता, सौंदर्य-बोध, चेतना की अवस्था और स्तर के कारण। वे अपने क्षुद्र अहं में मुग्ध रहते हैं, अपनी विशिष्टता पर स्वयं ही रीझते हैं।

ऐसा इसलिए है कि अपने को दूसरों से अलग मानने, अहंकार और श्रेष्ठता-बोध के कर्मगत अवरोध बहुत गहरे हैं। दूसरों से और आम लोगों से जुड़ाव टूट गया है, जिससे अकेलेपन का प्रश्न और गंभीर हो जाता है।

प्रकृति से जुड़ते समय यह समझना चाहिए कि बचपन में भी हम उससे जुड़ सकते थे। ऐसा नहीं है कि बड़े होकर अधिक सक्षम और अधिक सौंदर्य-बोध वाले बनने के बाद ही हम उससे जुड़ने योग्य हुए हैं। वास्तव में, अब हम इस मामले में बचपन जितने भी सक्षम नहीं हैं।

महसूस करें कि छोटे बच्चों और आम लोगों में, हर किसी में सहज पूर्णता और गहरी मानसिक समझ मौजूद है। साधना के अभिजनवाद को तोड़ें।