मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

झुआंगज़ी शृंखला

“अनुशासन से स्वतंत्रता मिलती है” एक छद्म अवधारणा है; स्वतंत्रता से अनुशासन आता है

नियमित और स्वस्थ जीवन तन और मन की सहज आवश्यकता है। ऊर्जा से भरपूर लोग स्वाभाविक रूप से नियमित और स्वस्थ जीवन जीते हैं। हर व्यक्ति सहज रूप से चाहता है कि वह स्वस्थ भोजन करे, नियमित समय पर सोए, कसरत करे और खेले-कूदे, काम और आराम में संतुलन रखे। इसके लिए जद्दोजहद या दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत नहीं होती। ऐसा आत्मानुशासन प्रकृति का नियम है, अपने ऊपर थोपी गई नियमावली नहीं।

“आत्मानुशासन का अभाव” मानव स्वभाव या सहज प्रवृत्ति नहीं है। उलटे, सवाल यह होना चाहिए कि “आत्मानुशासन का अभाव” लोगों की सहज प्रवृत्तियों पर हावी कैसे हो जाता है। लोगों में “आत्मानुशासन का अभाव” अक्सर मानसिक संसाधनों के चुक जाने, मानसिक टूटन से बचने और मानसिक आघात को सहलाने से पैदा होता है। बेतहाशा खाना और बहुत मीठा या तैलीय भोजन करना अक्सर काम के अत्यधिक और निचोड़ देने वाले दबाव से जूझने का तरीका होता है। देर रात तक फ़ोन चलाना अक्सर इसलिए होता है कि दिन भर में अपने लिए समय बहुत कम मिला, अपने ढंग से जीने के मौके बहुत कम मिले, स्व से जुड़ाव बहुत कम रहा, गहरे अनुभव बहुत कम हुए और भावनात्मक अनुभूतियाँ बहुत कम मिलीं। इसलिए लोग देर रात तक फ़ोन चलाकर अकेले होने और अपनी “स्वाभाविक” भावनाओं तथा संवेदनाओं को अनुभव करते हैं। यह आज के दौर में बैल-घोड़ों की तरह खटने वाले लोगों के श्रम के अलगाव का परिणाम है; आत्मानुशासन का अभाव स्वतंत्रता के अभाव से आता है। अधिक गंभीर मामलों में, आत्मानुशासन का अभाव आत्मविनाश की मनोवृत्ति से आता है। कुल मिलाकर, आत्मानुशासन का अभाव एक सामाजिक समस्या है, एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, एक कर्मगत अवरोध है। इसके पीछे अभिजनवाद द्वारा मेहनतकश वर्ग को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़कर नियंत्रित करना भी है।

खुद को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ना, खुद को दोष देकर आत्मानुशासन के लिए अपने ऊपर ज़बरदस्त दबाव डालना कोई खास काम नहीं आता; अक्सर इसका उलटा असर होता है। यह कठोर पराहम् और कठोर अहम् का कर्मगत अवरोध है। माता-पिता का बच्चों को उपलब्धियों की होड़ में लगातार धकेलना और उनके आत्मानुशासन पर भारी दबाव के साथ निगरानी रखना भी इसी तर्क पर चलता है। स्वस्थ ढंग से विकसित हो रहे बच्चे में इतनी बड़ी और इतनी अधिक समस्याएँ पैदा नहीं होंगी। समस्या फिर भी बुनियादी स्थितियों और आंतरिक प्रेरणा में ही होती है। और बच्चों को उपलब्धियों की होड़ में धकेलना तथा दबाव डालकर उनकी निगरानी करना खुद समस्या की जड़ों में से एक है। हम सब बड़े होने के इस रास्ते से गुज़रे हैं। कोई भी बच्चा ऐसा नहीं होता जो आगे बढ़ना न चाहे, सत्य, अच्छाई और सुंदरता की तलाश न करे। कोई ऐसा नहीं होता जो शिक्षक और माता-पिता का प्रिय तथा सहपाठियों का सम्मान पाने वाला अच्छा विद्यार्थी न बनना चाहे। प्राथमिक विद्यालय की कक्षा में सभी बच्चे कमर और पीठ सीधी करके बैठते हैं, बाँह मोड़कर हाथ उठाते हैं। मिडिल स्कूल से कुछ बच्चे कमर झुकाए, पीठ ढीली किए, मायूस और पस्त नज़र आने लगते हैं—उन सभी ने अपने भीतर और बाहर बड़ी समस्याओं का सामना किया होता है।

आत्मानुशासन पर ज़ोर लगाने के बजाय बुनियादी स्थितियों, मनोविश्लेषण और खुद से प्रेम करने पर ध्यान लगाएँ।

टिप्पणी: यह लेख भी उस विश्वदृष्टि, जीवनदृष्टि और मूल्यदृष्टि की व्यवस्था का एक हिस्सा है, जो ताओवादी दर्शन, जद्दोजहद के विरोध, स्वाभाविक प्रवाह के साथ चलने, खुद पर संदेह करने के विरोध आदि से मिलकर बनी है।