मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

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बातें लोगों को बदल नहीं सकतीं, केवल उनकी छँटाई करती हैं

मनुष्य केवल वही जान-समझ सकता है, जिसे जानने-समझने में वह सक्षम है

मनुष्य केवल उसी के प्रति कुछ महसूस करता है, जिसके प्रति उसमें अनुभूति है; यही द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है। मनुष्य के संज्ञान की वस्तुगत सीमाएँ होती हैं—वह वर्ग, व्यक्तित्व के आधार और आरंभिक परिवेश जैसे भौतिक आधारों से सीमित होता है।

छोटा और सूक्ष्म बुर्जुआ वर्ग पिछड़ा है, सर्वहारा वर्ग उन्नत है। किसी व्यक्ति की समझ अच्छी हो तो यह उसका सौभाग्य है, और अच्छी न हो तो दुर्भाग्य; यही नियति है।

मनुष्य की समझ अपनी स्वाभाविक राह और नियमों के अनुसार बढ़ती और बदलती है। दूसरों को “बदलने”, उनका रूपांतरण करने या उन्हें शिक्षित करने की कोई संभावना नहीं है।

हर समझ का अपना निश्चित उपभोक्ता समूह होता है

समझ का समान आधार ही सहमति है।

किसी समझ और विचार का छोटे और सूक्ष्म बुर्जुआ वर्ग में लोकप्रिय होना अच्छी बात नहीं है; उलटे, वह अक्सर उसकी सतही और साधारण प्रकृति को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, मानव स्वभाव को बुरा मानना, अभिजनवाद, बुद्धिलब्धि का सिद्धांत और मेहनत का सिद्धांत।

क्या लोकप्रिय है, इसकी चिंता करना छोटे और सूक्ष्म बुर्जुआ वर्ग की लोकलुभावन प्रवृत्ति है, वृहद् अन्य को रिझाना है।

जब प्रचलित सहमति की सीमा पार कर दी, तो वह अपने पक्ष की घोषणा है।

अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास देखें

मार्क्स, च्वांग-त्सु और लू शुन जैसे महान व्यक्तियों की समझ और विचारों से भी केवल कुछ ऐसे लोग जुड़ पाते हैं, जिनका उनसे संयोग बनता है; फिर हम साधारण लोगों की तो बात ही क्या। 20वीं सदी के पूर्वार्ध में, जब विश्व भर में मार्क्सवाद का प्रभाव अपने सर्वोच्च शिखर पर था, तब चीन और रूस में भी सचमुच मार्क्सवाद को मानने वाले कितने थे? विरले ही। फिर बाकी की तो बात ही क्या।

मार्क्स–च्वांग-त्सु मनोविज्ञान, मार्क्स और च्वांग-त्सु के दो “अल्पप्रचलित” विचारों का “उपसमुच्चय” होने के नाते, अनिवार्य रूप से और भी कम लोगों तक सीमित होगा। लेकिन महान मार्ग के रूप में उसे सर्वहारा वर्ग, जनता और सरल लोगों के बीच अनिवार्य रूप से सहमति मिलेगी; वह वास्तविक जनसमुदाय के अनुरूप है। जनता मार्क्स और च्वांग-त्सु के कथनों को नहीं समझती, लेकिन उनकी आत्मा और उनके पक्ष को समझती है और उनका समर्थन करती है।

उन्नत और सही समझ का काम लोकप्रिय होना या शिक्षित करना नहीं, बल्कि चयन करना और सहमति को एकजुट करना है। अल्पसंख्यक समूह के भीतर, और उस समूह तथा जनसमुदाय के बीच सहमति को एकजुट करना। अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का पूरा इतिहास ऐसा ही रहा है—घोषणापत्र से लेकर सामाजिक जनवादी पार्टी की जगह CCP के आने, बोल्शेविकों और मज़दूर-किसान लाल सेना आदि तक, सब ऐसा ही है। इतिहास में जी रहे लोगों के लिए यह केवल अपना पक्ष चुनना है।

मार्क्स–च्वांग-त्सु मनोविज्ञान की ऐतिहासिक स्थिति और भूमिका 21वीं सदी के साइबरपंक और सामाजिक परमाणुकरण के युग में एक सहमति, एक पक्ष और चयन का एक मानदंड होना है।

केवल चयन करना

मनुष्य का मनुष्य से संबंध केवल संयोग का है। समझ वर्तमान क्षण में होती है।

दूसरों को “बदलना” एक विशाल कर्मगत अवरोध है। केवल चयन करना परिपक्वता का बुनियादी रूप है। कथन अपने स्वभाव से जुड़ाव के लिए हैं, कर्मगत अवरोधों में उलझने के लिए नहीं।

गलत व्यक्ति से बेकार की बातें करके आप केवल अपनी मूर्खता ही संप्रेषित करते हैं; बाहर से देखने वाले को बात साफ़ दिखाई देती है। सामने वाला केवल इस मूर्खता को सहता है या उसका लाभ उठाता है।

बहुत से लोग लेनिनवाद को प्रचार, शिक्षा और रूपांतरण समझने की भूल करते हैं; वास्तव में वह केवल चयन करता है।

मनुष्य की सीमाओं, भाषा की सीमाओं और ऐतिहासिक सीमाओं को पहचान पाना; वचनरहित, अकर्म, सामर्थ्यरहित और अनासक्त रहना; तथ्यों से सत्य खोजना और नियमों के अनुरूप चलना—यह भी समझ का सौभाग्य है।

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