मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

कर्मजनित बाधाओं की शृंखला

सोते समय साधक के अहं की भागदौड़ दिखाई देना

किसी साधारण-सी शाम, बिस्तर पर लेटा हूँ, मन में तरह-तरह के विचार उड़ रहे हैं, भावनाएँ उमड़ रही हैं।
इसी समय एक छोटे-से अहं को व्यस्त देखता हूँ, जो लगातार नए निर्देश दे रहा है: तुम्हें ऐसा करना चाहिए, वैसा करना चाहिए, तुम्हें अपनी साँसों को सँभालना चाहिए, तुम्हें भावनाओं और पीड़ा को अपनी पहचान नहीं बनाना चाहिए, विचार तुम नहीं हो, मन में भटकते खयाल तुम नहीं हो, वगैरह। “मेरी सुनो, मैं ही ‘मूल स्व’ हूँ।”
इस पल “मुझे” एहसास होता है कि तुम “मूल स्व” नहीं हो। तुम तो बस “साधक का छोटा-सा अहं” हो।
फिर “मैं” देखता हूँ कि विचार और भी बिखरने और उलझने लगे हैं। कुछ बेतरतीब, अतार्किक, अतियथार्थवादी चेतना-प्रवाह एक-दूसरे की जगह लेने लगते हैं। मैं जानता हूँ कि मेरा मस्तिष्क बेहद थक चुका है और अब नींद और जाग के बीच की स्वप्निल अवस्था में प्रवेश करने वाला है।
बंद।