मार्क्स और झुआंगज़ी का मनोविज्ञान मार्क्स + झुआंगज़ी का दर्शन · हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है

जुड़ाव शृंखला

खुद से, मिठाई की दुकानों से और स्वतंत्र रचनाकारों के छोटे वीडियो से सुलह—ये वीडियो तभी देखें जब आपकी ऊर्जा और आंतरिक लय ऊँची हो

एक、चुंबकीय क्षेत्रों का परस्पर आकर्षण, मन के साथ बदलती परिस्थितियाँ

स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो तभी स्क्रॉल करने चाहिए, जब आपकी आवृत्ति और ऊर्जा ऊँची हों।

जब आपकी आवृत्ति और ऊर्जा ऊँची होती हैं, तो स्क्रॉल करते हुए भी ऊँची आवृत्ति और ऊर्जा वाली सामग्री मिलती है। उस समय आपकी निजी सीमाएँ भी मज़बूत होती हैं और जुड़ाव भी गहरा होता है। आपका मूल स्व दुनिया के सत्य, अच्छाई और सुंदरता के साथ अनुनाद करता है।

जब आपकी आवृत्ति और ऊर्जा नीची होती हैं, तो स्क्रॉल करते हुए भी नीची आवृत्ति और ऊर्जा वाली सामग्री मिलती है। उस समय निजी सीमाएँ भी कमज़ोर होती हैं और जुड़ाव भी कम होता है। नीची आवृत्ति के साथ अनुनाद होता है और क्षुद्र अहं मज़बूत होता है। मस्तिष्क यंत्रवत वही सब दोहराता रहता है, मानो मिठास का आदी कोई मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति, जो रुक ही नहीं पाता। छोटे वीडियो ठीक “मस्तिष्क की माँग” के अनुरूप बनी मिठाई हैं। मस्तिष्क दसियों करोड़ वर्षों के विकास से बनी एक उन्नत चीज़ है। हालाँकि वह पूर्ण नहीं है, फिर भी उसका इस तरह इस्तेमाल करना कुछ हद तक उसकी बेकद्री करना है।

इन पिछले दो वर्षों में मेरी मनःस्थिति अच्छी रही है। कई बार श्याओहोंगशू स्क्रॉल करते हुए मुझे गहरी शांति, भावुकता और जुड़ाव का अनुभव होता है। वेइबो और झीहू से मुझे ऊँची आवृत्ति का एहसास बहुत कम मिलता है; वहाँ आसानी से नीची आवृत्ति वाली पुनरावृत्ति में फँस जाता हूँ। इसके मुकाबले श्याओहोंगशू पर जगत को, तमाम जीवों को और स्वयं को देख पाना अपेक्षाकृत आसान है। (इससे पहले श्याओहोंगशू का विश्लेषण करते हुए कुछ लेख लिख चुका हूँ।)

लेकिन जब आवृत्ति और ऊर्जा ऊँची होती हैं, तो स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो की उतनी “ज़रूरत” नहीं रहती। न जानकारी, रिश्तों और जुड़ाव की कमी होती है, न नए रोमांचक अनुभवों की तीव्र चाह। स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो जितनी ऊँची आवृत्ति और ऊर्जा सँजो सकते हैं, उसकी आखिर एक सीमा है। और ऊँची आवृत्ति तथा ऊर्जा अंततः मूल स्व की शांति और सहजता से ही आती हैं।

दो、अभाव से जूझते लोग पेड़ के ठूँठ के पास खरगोश का इंतज़ार करते हैं

कई बार “स्क्रॉल करना” एक तरह की प्रतीक्षा है—उसी पेड़ के ठूँठ के पास फिर किसी खरगोश के आ टकराने की आस में बैठे रहना, या पति की प्रतीक्षा करते-करते पत्थर बन जाना।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि लोगों को स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो से कभी कोई अच्छी चीज़ मिली ही नहीं। ठीक इसलिए कि कभी वहाँ से थोड़ी-सी अच्छी चीज़ मिली थी, अभाव से जूझते लोग उसी ठूँठ के पास खरगोश का इंतज़ार करते रहते हैं, चलती नाव पर निशान बनाकर उसी निशान के सहारे पानी में गिरी तलवार खोजते रहते हैं।

लोग गहरे रिश्तों, प्रेम और दुनिया तथा दूसरे लोगों के साथ गहरे जुड़ाव की लालसा रखते हैं। झगड़ा, हमला और गुस्सा भी एक तरह का जुड़ाव तो हैं।

यानी स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो की “लत” तंबाकू या शराब की लत जैसी नहीं, बल्कि मिठाई की दुकान की लत जैसी है।

तीन、अपने आप से, मिठाई की दुकान से, स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो से सुलह

स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो आखिर मिठाई ही हैं। श्याओहोंगशू जैसे मंचों पर घूमना मिठाई की दुकान में घूमने जैसा है। उनसे बाघ जैसा डरने की ज़रूरत नहीं, और उनमें डूब भी नहीं जाना चाहिए। मिठाई की दुकान से सुलह करना हर बच्चे और हर आधुनिक मनुष्य के सामने एक सीख है। ‘फ्रेंड्स’ में मोनिका के मनोचिकित्सक उससे कहते हैं: वह सिर्फ़ खाना है, प्रेम नहीं।

मिठाई की दुकान से बाघ जैसा डरना, खुद से घृणा करना, उसे कोसना, कसमें खाना और भड़क उठना—ये मन के कर्मगत अवरोधों और प्रेम के अभाव में जी रहे बच्चे की दशा को और अधिक उजागर करते हैं।

जैसे मिठाई की दुकान में कम चीनी, अच्छी गुणवत्ता की पशु-दुग्ध से बनी क्रीम और सुंदर, प्यारे आकार वाली अच्छी मिठाइयाँ भी होती हैं (हालाँकि दुर्लभ हैं)। मन और शरीर की स्थिति अच्छी हो, तो व्यायाम के बाद कभी-कभार ऐसी एक मिठाई खाने से तन-मन पर कोई बोझ नहीं पड़ता। केवल ऐसे समय ही मिठाई के साथ सचमुच गहरे जुड़ाव, उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने का रिश्ता बनता है। बिना ठीक से चखे गटक जाने और खुद से घृणा करने वाला विषाक्त रिश्ता नहीं।

लेकिन जब मनःस्थिति अच्छी न हो, तो मिठाई की दुकान से कुछ दूरी ही रखें (तरह-तरह के ऐप अनइंस्टॉल कर दें)। नज़र से दूर, तो मन को सुकून। अगर दूर रहने से मदद मिलती है, तो यह अच्छी बात है; बस दूर रहें।

अपने आप से, मिठाई की दुकान से, स्वतंत्र रचनाकारों की सामग्री और छोटे वीडियो से सुलह करें, और उनके साथ स्वस्थ रिश्ते में रहें।

छोटे वीडियो को लेकर मेरी मनःस्थिति भी बहुत विरोधाभासी और जटिल रही है। पहले मैं उन्हें बस तुच्छ समझता था। फिर मैंने महसूस किया कि इस रवैये में अभिजनवाद, परीक्षा के सवाल हल करके आगे बढ़ने वाले व्यक्ति की चिंता, छोटे वीडियो के दौर में अचानक अमीर बने लोगों के प्रति ईर्ष्या और जलन (जिसमें बड़ी टेक कंपनियों में ऊँचे पदों पर पहुँचे मेरे सहपाठियों और हमउम्रों से महसूस होने वाला दबाव भी शामिल था), और किशोरों की शिक्षा को लेकर चिंता भी मिली हुई थी। बाद में मैं उन्हें अपेक्षाकृत तटस्थ नज़र से देखने लगा। आगे चलकर मैंने खुद मार्क्स और एंगेल्स के संपूर्ण संकलित लेखन की वीडियो व्याख्याएँ बनाने का निर्णय लिया। इसके पीछे भी यही विचार था कि विचारों का प्रचार समय के अनुरूप होना चाहिए।