मार्क्सवाद के उत्साही लोगों के आम कर्मगत अवरोध
प्रस्तावना:
- मार्क्सवाद के अनुरागियों में भी कुछ सामान्य कर्मगत अवरोध होते हैं, जो मूलतः उनके अपने छोटे और अति-छोटे बुर्जुआ वर्ग के कर्मगत अवरोध हैं।
मार्क्सवाद के अनुरागी अक्सर विद्यार्थी, बुद्धिजीवी और छोटे या अति-छोटे बुर्जुआ होते हैं। सर्वहारा के पास आम तौर पर इतना समय, ऊर्जा और सूचना के साधन नहीं होते कि वे मार्क्सवाद के इतिहास की जटिल विचार-व्यवस्था से परिचित हो सकें।
बहुत-से लोगों में स्वतंत्र चिंतन, तथ्यों के आधार पर सत्य की खोज और समय के साथ आगे बढ़ने की कमी होती है।
- ऐतिहासिक विशिष्टता
मार्क्सवाद का इतिहास तीन कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के इतिहास से बहुत गहराई से बँधा हुआ है; वह नेताओं, अग्रदूतों, रक्तपात, युद्ध और विराट परिवर्तनों जैसे आख्यानों से भी बहुत गहराई से बँधा हुआ है।
मार्क्सवाद की बहुत-सी सामग्री भारी उथल-पुथल के युगों में अंतरराष्ट्रीय नेताओं की रणनीतियाँ हैं। वह साइबरपंक के दौर में कथुलु का सामना करने वाले सामान्य लोगों के लिए सुख, मानवकेंद्रित जीवन और अस्तित्व तथा विकास की राह खोजने की विधियाँ नहीं है। 《मार्क्स + च्वांग-त्सु + मनोविज्ञान: नीचे से ऊपर की ओर उभरता मार्क्सवाद》, 《समकालीन मार्क्सवादी जीवन: छोटी-छोटी चिंगारियाँ, एक-दूसरे को आलोकित करती हुईं》
उदाहरण के लिए, मानववाद और अलगाव पर मार्क्स की चर्चा वाली 《1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियाँ》 से पश्चिमी समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक आधी सदी से चुपके-चुपके सीखते रहे हैं, और फिर उसका रूप बदलकर जनता को उपचार बेचते रहे हैं। लेकिन मार्क्सवाद के अनुरागियों में ही इस दृष्टिकोण की कमी है; वे नहीं जानते कि इस युग और जनता की अनिवार्य ज़रूरतें क्या हैं।
अगर छोटे और अति-छोटे बुर्जुआ वर्ग के कर्मगत अवरोध पढ़े-लिखे लोगों को सचमुच मार्क्सवाद में प्रवेश करने से न रोकते, तो दुनिया भर में मार्क्सवादी इतने कम न होते।
- मैं स्वयं स्वीकार करता हूँ कि मैं अपेक्षाकृत पिछड़े अति-छोटे बुर्जुआ वर्ग से हूँ।
a. आज का समय वर्गीय पृष्ठभूमि तय करके लोगों को ऊँचे-नीचे दर्जों में बाँटने का समय नहीं है; हम तथ्यों के प्रति कुछ अधिक ईमानदार हो सकते हैं।
b. बहुत-से महान व्यक्ति धनी किसानों और पुराने सैन्य सरदारों के परिवारों से आए थे। प्रतिकूल वर्गीय पृष्ठभूमि व्यक्ति को छोटे और अति-छोटे बुर्जुआ तथा सामंती कर्मगत अवरोधों से अधिक परिचित कराती है।
c. यह लेख भी मार्क्सवाद के निकट आने, उसकी ओर बढ़ने और उसे समझने की प्रक्रिया में मेरे अपने तथा बहुत-से अन्य लोगों के बारे में किए गए अवलोकनों का सार है। मैं 2020.10 में मार्क्सवाद की ओर बढ़ा, और 2023 तथा 2024 में जब मैंने ताओवाद और च्वांग-त्सु के अभ्यास की पद्धति से मार्क्सवाद-लेनिनवाद का अभ्यास करने के बारे में लिखा, तभी मेरी सोच में अधिक स्पष्ट मोड़ आया।
d. इस लेख में बताए गए कुछ कर्मगत अवरोधों की आदतगत छापें अभी भी मुझमें बची हुई हैं। जैसा कि लेख में लिखा है, यह लेख मुख्यतः आत्मालोचना और सजग आत्म-अवलोकन के लिए है।
एक, निम्नलिखित सामान्य कर्मगत अवरोध:
(一) सर्वशक्तिमान आत्ममोह
- अतिमानव की पूजा
इसकी प्रमुख अभिव्यक्तियाँ हैं व्यक्तिपूजा, इतिहास का अभिजनवादी दृष्टिकोण, और “जनता को प्रबुद्ध करने के सिद्धांत तथा उनके संघर्ष न करने पर क्रोध” की पैरवी। यह ऐतिहासिक भौतिकवाद नहीं, इतिहास का नायकवादी दृष्टिकोण है। यह सर्वशक्तिमान आत्ममोह की नेपोलियन ग्रंथि है।
- क्षमता के प्रति आसक्ति
मार्क्सवाद के इतिहास में असाधारण क्षमता वाले बहुत-से व्यक्ति हुए हैं। बहुत-से लोग आसानी से क्षमता को मार्क्सवाद से जोड़ बैठते हैं। लेकिन मार्क्सवाद सामान्य लोगों और क्षमताहीन लोगों का दर्शन है, वामपंथ का दर्शन है, दक्षिणपंथी अभिजनों का दर्शन नहीं।
च्वांग-त्सु का दर्शन जिस अक्षमता, अकर्म और अनुपयोगिता पर ज़ोर देता है, वह सामान्य लोगों का दर्शन है।
- सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान होने की कल्पना
मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन जैसे नेताओं के दूरगामी भविष्य संबंधी अनुमानों की चर्चा बड़े चाव से की जाती है। इससे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान होने की कल्पना आसानी से सक्रिय हो जाती है। वास्तव में मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन भी भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर सकते थे; वे केवल अंतर्दृष्टि रखने वाले विशेषज्ञों के रूप में उन व्यापक रुझानों को समझते थे, जिनसे उस क्षेत्र के जानकार परिचित थे।
- इतिहास बदल देने और इतिहास में विराट परिवर्तन की कल्पना
यह ऐतिहासिक भौतिकवाद के अनुरूप नहीं है। अक्सर यह मनोविज्ञान के दायरे में आने वाली नकार और पलायन जैसी रक्षा-प्रक्रियाएँ भर होती हैं।
(二) श्रेष्ठताबोध
- केवल मैं ही जागरूक हूँ, केवल मैं ही सदाचारी हूँ, केवल मेरा ही सिद्धांत सही है—इससे मिलने वाला श्रेष्ठताबोध और अपने अस्तित्व का एहसास
- गौरवपूर्ण एकाकीपन
दूसरों द्वारा न समझे जाने का वह अकेलापन और अन्याय सहने का एहसास छोटे अहं को और छोटा तथा बंद कर देता है—अलग-थलग, सिमटा हुआ और रक्षात्मक। इससे छोटा अहं व्यापार की दुनिया, पूँजीवादी दुनिया और इंटरनेट की दुनिया को ठुकराने तथा उनसे डरने लगता है।
इसके कई स्रोत हैं: श्रेष्ठताबोध, अपनी महानता की कल्पना को ठेस लगना, दूसरों से जुड़ाव टूटना, भीतरी तनाव का प्रक्षेपण, त्याग का आख्यान, स्व-वस्तु संबंधी ज़रूरतों का हताश होना, और रोगात्मक आदर्शीकरण तथा प्रतिबिंबन की ओर बढ़ना। इसका अतीत के उद्धारकर्ता व्यक्तित्व और उससे जुड़े अकेलेपन तथा अन्याय सहने के एहसास से एक समान, परिचित और पीड़ादायक संबंध होता है।
कुछ अपेक्षाकृत “वस्तुगत” कारण भी हैं: 1. वास्तविक ख़तरे और तनाव—ऑनलाइन उत्पीड़न, नियामकीय निगरानी—जो रक्षात्मक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं; 2. युग की पीड़ा के प्रति सहानुभूति।
- नवदीक्षित का उन्माद
यह एक तरह का अस्तित्ववादी प्रश्न है। खोज के दौर से गुज़र रहे, यहाँ तक कि भीतर के खालीपन से जूझ रहे बहुत-से युवाओं को मार्क्सवाद की दुनिया बहुत प्रबल पहचान और श्रेष्ठताबोध दे सकती है। इससे वास्तविकता से दूरी बढ़ती है और वास्तविक जीवन के लोगों तथा घटनाओं से जुड़ाव कम होता है।
(三) निरुत्साह का भाव
- अपनी चिंता और तनाव, वास्तविक समाज की समस्याओं तथा जनता के दुःख के प्रति सहानुभूति, समान पीड़ा के कारण एक-दूसरे से हमदर्दी, राजनीतिक अवसाद
- सत्यनिष्ठ और व्यावहारिक न हो पाना, समय के साथ आगे न बढ़ पाना, तथा वास्तविक प्रतिक्रिया और आदर्श के बीच अंतर से उपजी हताशा
- इतिहास के उतार वाले दौर से उपजी हताशा और निरुत्साह, महान व्यक्तियों के भी विफल होने पर आदर्श टूटने का एहसास
- गौरवपूर्ण एकाकीपन और भेद करने वाली मानसिकता से उपजा अकेलापन तथा अन्याय सहने का एहसास
- छोटे और अति-छोटे बुर्जुआ के प्रति ललक और ईर्ष्या
(四) भारी दायित्व का एहसास
- उद्धार की ग्रंथि
पूर्वी एशिया के बच्चों में मूल परिवार के भीतर सशर्त ध्यान मिलने के परिवेश से विकृत हुआ दूसरों को खुश रखने वाला व्यक्तित्व और उद्धारकर्ता व्यक्तित्व, आगे चलकर पूरी दुनिया को बचाने तक फैल जाता है।
जनता को मार्क्सवादियों द्वारा बचाए जाने की ज़रूरत नहीं है। उलटे, मार्क्सवादियों को हमेशा जनता ही बचाती है। 4·12 के बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को किसानों के आंदोलन में घुलना-मिलना पड़ा, पहाड़ों में जाना पड़ा, तभी उसे आगे की राह मिल सकी।
- आह्वान का एहसास
यह अपेक्षाकृत सकारात्मक, लेकिन बोझिल पहलू है। मार्क्सवाद के इतिहास में इतना रक्तपात, बलिदान और मौन समर्पण रहा है कि वर्तमान के उतार वाले दौर से उसका अंतर बहुत नाटकीय लगता है। युवाओं के भीतर इससे सहज ही बीते मनीषियों की टूटी ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाने और पूर्वजों के पीछे एक के बाद एक संघर्ष में उतरने का आह्वान जाग सकता है।
लेकिन मार्क्सवाद को किसी से बचाए जाने की ज़रूरत नहीं है; वह वस्तुगत सत्य है।
- आत्मबलि की ग्रंथि
पूर्वी एशिया के बच्चों में अपने मूल सामाजिक परिवेश के अनुशासन से गढ़ी गई आत्मबलि की ग्रंथि। वास्तव में यह अपने और दूसरों के समय तथा जीवन को पर्याप्त मूल्य न देना है।
(五) भेद करने वाली मानसिकता
- द्वंद्वात्मक ढंग से न सोच पाना
रेखीय, रूढ़िबद्ध और अतिवादी सोच।
दक्षिणपंथियों को एक ही खाँचे में रख देना, और वामपंथ के “पर्याप्त उग्र न होने वालों” से गहरी घृणा करना। दक्षिणपंथ में वामपंथी तत्व होते हैं, वामपंथ में दक्षिणपंथी तत्व होते हैं, और मौखिक रूप से वामपंथ के अनुरागी कहलाने वालों में बहुत-से घोर दक्षिणपंथी होते हैं। इन सबको वास्तविक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना चाहिए।
- किसानों और निम्न-मध्यवर्ग को अत्यधिक नीचा दिखाना;
यह वामपंथी तथा मध्यवर्ती शक्तियों को एकजुट करने के शास्त्रीय सिद्धांत के अनुरूप नहीं है; न ही यह पारस्परिक संबंधों और वास्तविक जीवन में अस्तित्व तथा विकास की व्यावहारिक ज़रूरतों के अनुरूप है। वास्तव में इसका संबंध अक्सर अपने ही कर्मगत अवरोधों से होता है—जैसे ग्रामीण परिवारों और छोटे कस्बों से आए परीक्षा-केंद्रित विद्यार्थियों की गाँव के प्रति अपनी घृणा, शहरों के परीक्षा-केंद्रित विद्यार्थियों का गाँव से भय, या विद्यार्थियों तथा अति-छोटे बुर्जुआ की निम्न-मध्यवर्ग के प्रति ललक और ईर्ष्या।
मार्क्सवाद द्वारा निम्न-मध्यवर्गीय प्रवृत्तियों की आलोचना का, विशेषकर इस युग में, अधिक महत्त्वपूर्ण उपयोग आत्मालोचना और सजग आत्म-अवलोकन के लिए है।
- श्रमिक समुदाय की कुछ नकारात्मक घटनाओं और उसके भीतर के आगे के विभाजनों को सही ढंग से न समझ पाना
“उनके संघर्ष न करने पर क्रोध करना”, डगमगाना और उलझन में पड़ना।
- सामान्य लोगों की सीमाओं का सम्मान न कर पाना
अपने सामान्य होने, अपनी सीमाओं और अपनी निम्न-मध्यवर्गीय मनोव्यथा के प्रति सजग न होना।
या फिर अपनी सीमाओं और कमियों को अनसुना कर देना, लेकिन कोई आम आदमी थूक दे तो ऊँची आवाज़ में उसे अज्ञानता कहना।
(六) रक्षात्मक मानसिकता
- वास्तविक जीवन में हमलों का शिकार होना, ऑनलाइन उत्पीड़न और सामाजिक तनाव
- भीतरी तनाव का प्रक्षेपण—क्रोध, असहायता, आक्रामकता, नीचा दिखाना
- उत्पीड़ित किए जाने का भ्रम
दो, मार्क्सवादियों को उजला होना चाहिए
ऊपर बताए गए अनेक कर्मगत अवरोधों में “छोटा अहं” अभिव्यक्त होता है, जनता और इतिहास से जुड़ा व्यापक स्व नहीं।
उजला होना चाहिए, उदास और अँधेरा नहीं।
करुणाशील होना चाहिए, कटु नहीं।
उदार और सहज होना चाहिए, सिमटा और सहमा हुआ नहीं।
सजग होना चाहिए, आत्ममुग्ध नहीं।
आत्मालोचना पर ज़ोर होना चाहिए, दूसरों की आलोचना पर नहीं।
एकजुट करने में कुशल होना चाहिए, स्वयं को अलग-थलग करने वाला नहीं।
व्यावहारिक और ठोस होना चाहिए, अमूर्त बातों में उलझकर वास्तविकता से बचने वाला नहीं।
जनता की सेवा करने वाला होना चाहिए, आम लोगों को हिकारत से देखने वाला नहीं।
तीन, तथ्यों के आधार पर सत्य की खोज
शास्त्रीय सिद्धांतों को समकालीन ठोस व्यवहार से जोड़ना सबसे कठिन पाठ है, और वही आवश्यक पाठ भी है।
मार्क्सवाद के बहुत-से अनुरागी अभी भी कर्मगत अवरोधों के स्तर पर हैं। वे अभी शास्त्रीय सिद्धांतों की अंतर्दृष्टि के स्तर तक नहीं पहुँचे हैं, और ठोस व्यवहार का भी अभाव है। शास्त्रीय सिद्धांतों तथा ठोस व्यवहार को जोड़ने के स्तर तक पहुँचना तो और भी दूर है।
च्वांग-त्सु के अनुरागी मार्क्सवाद की ओर बढ़ें, मार्क्सवाद के अनुरागी च्वांग-त्सु की ओर बढ़ें
पहले मैं सोचता था, “च्वांग-त्सु में मार्क्सवाद नहीं, मार्क्सवाद में च्वांग-त्सु नहीं”—इन दोनों धाराओं के बीच इतनी दूरी क्यों दिखाई देती थी?
क्योंकि मार्ग की दृष्टि से, मार्क्सवाद की ओर बढ़ना और च्वांग-त्सु की ओर बढ़ना बुद्धिजीवी निम्न-मध्यवर्ग के दो सामान्य, अलग-अलग रास्ते हैं, और दोनों के अपने निम्न-मध्यवर्गीय कर्मगत अवरोध हैं।
च्वांग-त्सु की ओर बढ़ने वाले लोग विराट आख्यानों, सामाजिक विज्ञानों और इतिहास बदलने की रुचि से जल्दी विदा ले लेते हैं, और वर्तमान में जीने के भाव में रम जाते हैं; इसलिए स्वाभाविक रूप से उनका मार्क्सवाद की ओर बढ़ना आसान नहीं होता। मार्क्सवाद की ओर बढ़ने वाले अनुरागी अक्सर ऊपर बताई गई उलझनों में फँसे रहते हैं और च्वांग-त्सु से बहुत दूर होते हैं। वहीं 19वीं और 20वीं सदी के मार्क्सवादियों के सामने क्रांति का प्रश्न था, इसलिए वे च्वांग-त्सु की ओर नहीं बढ़ते थे।
21वीं सदी के पूर्वार्ध के साइबरपंक युग में, यदि रास्ता सही हो, तो मार्क्सवाद के अनुरागियों को अंततः च्वांग-त्सु की ओर बढ़ना होगा, और च्वांग-त्सु के अनुरागियों को अनिवार्यतः मार्क्सवाद की ओर बढ़ना होगा। मैं स्वयं और मेरे कुछ मित्र इसके उदाहरण हैं। जैसे जापान की चिज़ुको उएनो को नारीवाद का अध्ययन करने के लिए अनिवार्यतः पितृसत्ता और पूँजीवाद का अध्ययन करना पड़ता है।
कुछ खींचकर कहा जाए तो मार्क्स स्वयं मार्क्सवाद से च्वांग-त्सु की ओर बढ़ने का उदाहरण हैं। युवावस्था में वे ऊर्जावान, महत्त्वाकांक्षी और आकाश-पृथ्वी से जूझने वाले थे—हालाँकि उनका डॉक्टरेट शोधप्रबंध एपिक्यूरस पर था, जो यूनान के च्वांग-त्सु थे। प्रौढ़ावस्था में उनकी मनःस्थिति अत्यंत शांत, संयत और ऐतिहासिक भौतिकवादी थी। एंगेल्स च्वांग-त्सु से मार्क्सवाद की ओर बढ़ने का उदाहरण हैं। युवावस्था में उनका स्वभाव उजला था, उनकी धूप दूसरों तक पहुँचती थी, वे सांसारिक ओछेपन से ऊपर थे और जनता के प्रति सहानुभूति रखते थे। क्षमता में असाधारण होने के बावजूद, अकादमिक जीवन और पेशेवर सफलता के प्रति उनमें लोभ, द्वेष और मोह नहीं था। लेकिन ठीक इसलिए कि वे मज़दूरों के प्रति सहानुभूति रखते थे और सत्यनिष्ठ तथा व्यावहारिक थे, इंग्लैंड में वे तेज़ी से साम्यवाद की ओर मुड़ गए।
20वीं सदी की बहुत-सी प्रभावशाली हस्तियाँ 21वीं सदी तक जीवित रहीं और वे भी च्वांग-त्सु तथा बौद्ध अनासक्ति की ओर मुड़ीं—इसका अर्थ क्रांति छोड़ना नहीं था। पहले मैं इसे नहीं समझता था, अब कुछ समझता हूँ। आज के वे सच्चे मार्क्सवादी भी अपने-अपने जीवन में चुपचाप छोटी-छोटी चिंगारियों की तरह जल रहे हैं।
इतिहास के उतार वाले दौर में अपनी आंतरिक शक्ति और आत्मा की रक्षा करना—यही समकालीन प्रश्न है।